tag:blogger.com,1999:blog-25230923.post2681646205869921115..comments2007-12-31T16:51:16.187+05:30Comments on मेरी कविताएँ: उनका मज़ाशैलेश भारतवासीhttp://www.blogger.com/profile/02370360639584336023noreply@blogger.comBlogger43125tag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-40607069817344658202007-12-31T16:51:00.000+05:302007-12-31T16:51:00.000+05:30sach maza aa gayasach maza aa gayaAnonymousnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-6521707915290848752007-07-21T14:17:00.000+05:302007-07-21T14:17:00.000+05:30वाह!सचमुच यहाँ तो विद्वानों की फौज मोर्चा सम्भाले ...वाह!<BR/>सचमुच यहाँ तो विद्वानों की फौज मोर्चा सम्भाले जमी हुई है,उपसर्ग प्रत्यय का ही प्रहार हो रहा है।<BR/><BR/><BR/><BR/>विलक्षण!!विभावरी रंजनhttp://www.blogger.com/profile/17929447279673536929noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-747495887744603032007-07-21T14:05:00.000+05:302007-07-21T14:05:00.000+05:30हिन्दी में इस का स्वरूप होता "परि" शब्दजैसे : परिभ...हिन्दी में इस का स्वरूप होता "परि" शब्द<BR/>जैसे : परिभाषा, परिकथा .. इत्यादि??????????????????????????????<BR/><BR/><BR/>एकबार मुझे व्यक्तिगत तौर से बतायें कि "परिकथा" क्या शुद्ध लिखा है? जानने की बड़ी ही तीव्र उत्कण्ठा हो रही है।विभावरी रंजनhttp://www.blogger.com/profile/17929447279673536929noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-15636425446301931852007-07-21T13:57:00.000+05:302007-07-21T13:57:00.000+05:30स्तरहीन कविता पर टेस्टी का मतलब बता कर बड़ा ही उपका...स्तरहीन कविता पर टेस्टी का मतलब बता कर बड़ा ही उपकार किया।विभावरी रंजनhttp://www.blogger.com/profile/17929447279673536929noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-44876990785994774012007-06-20T17:59:00.000+05:302007-06-20T17:59:00.000+05:30shaileshjikavita bahut sundar hai. main to kahungi...shaileshji<BR/>kavita bahut sundar hai. main to kahungi ki ye bhi bhavnaon ki ek abhivyakti hai.kavita kavi ke hriday ki sahaj abhivyakti hoti hai. usmain <BR/>itni mathapachhi wali tipaniyan mujhe kuch ajeeb lagin . khair pasand apni apni khayal apna apna. mujhe sahaj abhivyakti achhi lagi. badhayi ho.God bless urituhttp://www.blogger.com/profile/01880609153671810492noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-1215831749089462612007-06-19T12:26:00.000+05:302007-06-19T12:26:00.000+05:30महावीर जी,आपकी इस बात का कि टिप्पणियों से सीखना चा...महावीर जी,<BR/><BR/>आपकी इस बात का कि टिप्पणियों से सीखना चाहिए, मैं हमेशा से समर्थक रहा हूँ, इसीलिए <A HREF="http://merekavimitra.blogspot.com" REL="nofollow">हिन्द-युग्म</A> मंच पर टिप्पणियों को हमने इतना महत्व दे रखा है। आपको कभी अवसर मिले तो ज़रूर आयें।शैलेश भारतवासीhttp://www.blogger.com/profile/02370360639584336023noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-6364064595037471242007-06-18T05:53:00.000+05:302007-06-18T05:53:00.000+05:30बहर में ना होते हुए भी खासी अच्छी भली 'हज़ल' है। प...बहर में ना होते हुए भी खासी अच्छी भली 'हज़ल' है। पढ़ते हुए हंसी भी आ रही है, <BR/>अगर किसी कवि-सम्मेलन में भाव-भंगिमा को संभाल कर मंच पर उतर जाएं तो कहकहों के साथ तालियों की गड़गड़ाहट ज़रूर सुनाई देगी। <BR/>एक बात ज़रूर कहूंगा कि टिप्पणियों का एक पहलू यह भी है कि अगर सुधारने की गुंजाईश हो तो उस प्रकार की टिप्पणियों को प्रहार ना समझ कर वरदान मानना चाहिइए। वर्ना तो टिप्पणी शब्द हटा कर 'वाह वाही' आदि शब्दों का प्रयोग होना<BR/>चाहिइए। वास्तव में हम अधिकतर कवि 'विद्यार्थी' ही हैं, और टिप्पणियों को 'पाठशाला' की तरह मान लें तो रचनाओं में और भी निखार आने लगेगा। ब्लॉग-लेखन का एक यह भी पहलू है।<BR/><BR/>हम तो यही चाहेंगे ऐ दोस्त तिरी सूरत <BR/>कुछ और निखर जाए कुछ और संवर जाए।महावीरhttp://www.blogger.com/profile/00859697755955147456noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-34462891376630209612007-06-16T09:33:00.000+05:302007-06-16T09:33:00.000+05:30:) वाह बहुत ही नयी और ख़ूबसूरत रचना है ....पढ़ के...:) वाह बहुत ही नयी और ख़ूबसूरत रचना है ....पढ़ के हँसी रोकी नही गयी ...साथ ही इतनी अच्छी टिप्पणीया भी पढ़ने की मिली ....रंजूhttp://www.blogger.com/profile/07700299203001955054noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-44497682916694807322007-06-14T16:44:00.000+05:302007-06-14T16:44:00.000+05:30शैलेश भाई आज तो कविता के साथ-साथ टिप्पणी पढ़ कर मजा...शैलेश भाई आज तो कविता के साथ-साथ टिप्पणी पढ़ कर मजा आ गया..कोई तो गुरू की एक टिप्पणी को तरस जाता है मगर तुम्हे अपने आप ही दो-दो मिल गई....<BR/><BR/>बहुत अच्छे भाई लगे रहो...<BR/><BR/><BR/>सुनीताsunita (shanoo)http://www.blogger.com/profile/11804088581552763781noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-46883533307229644002007-06-14T15:44:00.000+05:302007-06-14T15:44:00.000+05:30प्यारे रिपुदमन भईया जी...ताल क्या ठोकें। आम की चर्...प्यारे रिपुदमन भईया जी...<BR/><BR/>ताल क्या ठोकें। आम की चर्चा में इस बात पर इशारा हो कि समोसे में इमली की चटनी डले या टमाटर की, तो भाई कविता पर हमारी समझ कुछ कम ही है। आप की विद्वत्ता को नमन। <BR/><BR/>मेरी आपसे असहमति है और इस बात को आपका चार किलोमीटर लम्बा लेख बदल नहीं सका चूंकि रामायण की चर्चा में अर्जुन का क्या करें?<BR/><BR/>प्रयोगों को व्याकरण के हरे चश्मे से परे भी देखिये तब सावन से आगे बात हो सकेगी। हिन्दी रचनाओं में उर्दू के शब्द या उर्दू जैसे शब्दों को कई बार व्याकरण में कसने के लिये प्रयोग में नहीं लाया जाता अपितु शैलीगत चमत्कार उत्पन्न करने के लिये किया जाता है। मसलन एक शब्द "लवस्कार" को लें जो कि हिंगलिश का कहा जायेगा और अशोक चक्रधर जी बहुधा प्रयोग करते हैं। ये गढे गये शब्द हैं और नयी कविता में इस प्रकार की मरोडन को मैं (अपनी निजी राय से)त्रुटिहीन ही मानता हूँ। यहाँ मसला न तो संयुक्त शब्दों का है न हिन्दी न ही उर्दू का। आपने कहा न कि जैसे "इबन-ए-मरियम ... उर्दू भाषा में ऐसी फ़ैसीलिटी है, कुछ अन्य भाषाओं में भी है, पर हिन्दी में नही है।" यदि गढी जायेगी यह फेसिलिटी तो इसी तरह गढी जायेगी, पूर्वाग्रह ग्रसित हो कर तो कविता निराला और दिनकर से कभी आगे ही नहीं बढेगी।हाँ आपने यह बात सही कही कि आपको मेरे मानने या न मानने से फर्क नहीं पडेगा..भाई मैने चाहा भी नहीं एसा। आपकी अपनी दिशा सही है और हमारी अपनी सोच। दोनो ही रास्ते रचनात्मक तो हैं..? <BR/><BR/>*** राजीव रंजन प्रसादराजीव रंजन प्रसादhttp://www.blogger.com/profile/17408893442948645899noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-48796749700995779992007-06-13T16:29:00.000+05:302007-06-13T16:29:00.000+05:30शैलेश चाचा, आपकी कविता बहुत अच्छी है। मैं अभी छोट...शैलेश चाचा, <BR/>आपकी कविता बहुत अच्छी है। मैं अभी छोटी हूँ इसलिये ज्यादा नहीं समझ पाई। पापा को कहूँगी पढ़्ने के लिये आपका ब्लोग। आप ऐसे ही लिखते रहिये सुन्दर -सुन्दर कवितायें ।इगाhttp://www.blogger.com/profile/02077517914171783767noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-75772394512866099372007-06-13T00:45:00.000+05:302007-06-13T00:45:00.000+05:30यह हज़ल विधा में निबद्ध है । शे'र वज़नदार हैं । जि...यह हज़ल विधा में निबद्ध है । शे'र वज़नदार हैं । जिस ग़ज़ल में हास्य, चुटकी, कटुक्ति, व्यंग्य का फैलाव ज्यादा होता है उसे हज़ल कहा गया है । उर्दू में भी यह परम्परा है । इस विधा को दैनिक भास्कर काफी समर्थन दे रहा है जो रविवासरीय अंक में कई बार और नामी लोगों की हज़ल छाप चुका है । <BR/><BR/>इस रचना में भी वह भाव है जो एक सिद्ध हज़ल में होना चाहिए । यह गीत नहीं है न ही गज़ल । हाँ, गज़ल़ के जो नियम स्थापत्य संबधी होते हैं वह यहाँ भी होता है । यह समकालीन कविता भी नहीं है मित्रो । <BR/><BR/>ऐसी रचनायें कवि-सम्मेलनों और मुशायरों पर भी खूब चल रही है । <BR/><BR/>हाँ, हिंदी साहित्य में यह विधा अभी पैर नहीं जमा सकी है । खास तौर पर अंगद की तरह । <BR/><BR/>साध सकते हो तो साधो, इस विधा में मारक भी होती है और मजा भी आता है श्रवणकर्ताओं को । <BR/><BR/>पर हरफनमौला होने से कहीं ज्यादा है किसी एक विधा को पकड़ो और इतना सिद्ध हो जाओ कि कहीं नाम भी हो जाये । मर्जी आपकी अपनी है । पर इसका मतलब यह नहीं कि एक ही विधा में लिखो, लिखते रहने का अभ्यास होना चाहिए । इससे दूसरी विधायें भी निखरती हैं । पर अतं में यही राय कि पहचान अक्सर एक ही विधा से बनाने की तैयारी होनी चाहिए और यही होता भी है । <BR/><BR/>जानते हैं कि रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक कविता भी लिखते थे, पर उन्हें कोई कवि नहीं कहता । <BR/><BR/>बधाई ।जयप्रकाश मानसhttp://www.blogger.com/profile/16792869521782040232noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-72687612978516983262007-06-12T22:22:00.000+05:302007-06-12T22:22:00.000+05:30hmm tumhari si kavita main sach bhi hai bayang bhi...hmm tumhari si kavita main sach bhi hai bayang bhi hai aur haasya bhi hai<BR/><BR/>mujhe padhna achha laga <BR/><BR/>but dear yahi to hai wo jaha sab ladhke paise ganvakar bhi khush ho jaate hain hahaha ab apna apna experience aise hi bataoge na kyu ji ?shrdhhttp://www.blogger.com/profile/08270461634249850554noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-24287384552056770662007-06-12T22:09:00.000+05:302007-06-12T22:09:00.000+05:30Such a wonderful scarp........Meri Shaadi to nahi ...Such a wonderful scarp........Meri Shaadi to nahi hui lakin aise problem mere saath bhi hoti hai......very nice thinking........my all best wishes are always with u.......<BR/><BR/>thanks again<BR/>AdityaAddyhttp://www.blogger.com/profile/01288493580240485381noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-48241063863992996642007-06-12T12:12:00.000+05:302007-06-12T12:12:00.000+05:30वाह भाई, बढ़िया कविता है। पढ़कर मज़ा आ गया। 'जाम-ए-नै...वाह भाई, बढ़िया कविता है। पढ़कर मज़ा आ गया। 'जाम-ए-नैन' का प्रयोग भी अनूठा लगा।Pratikhttp://www.blogger.com/profile/02460951237076464140noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-91796768844286409612007-06-12T05:03:00.000+05:302007-06-12T05:03:00.000+05:30"निगाह-ए-जाम" को बक्श दो भाई ... =================..."निगाह-ए-जाम" को बक्श दो भाई ... <BR/>==========================<BR/>भाई साहब राजीव, कवि शैलेश, और पाठक अजय यादव जी,<BR/><BR/>१. "जाम-ए-नैन" को गलत बताया गया, वो इसलिये क्योंकि वो गलत ही है ( विस्तार से बताऊँगा कि क्यो है)<BR/><BR/>२. "निगाह-ए-जाम" या "जाम-ए-निगाह" पर क्यों बहस कर रहे हैं आप यह तो उदाहरण है, संयुक्त शब्द बनाने का, मैंने कहा "निगाह-ए-जाम" ठीक होता वह कविता की गेयता और अर्थ को देखते नहीं कहा अपितु व्याकरण की दृष्टि से कहा है. सो इस बात पर निर्थक चरचा ना करें। यह शैलेश के "जाम-ए-नैन" का रिप्लेसमेंट नहीं हैं मित्र .. ज़रा मर्म तक तो पहूँचें, या कोशिश मात्र भी करें तो बेहतर होगा।<BR/><BR/>३. मेरे भाई शैलेश ये प्रतय्य उप्सर्ग नही हैं मेरे भाई !!!<BR/>जो उमने उदाहरण दिये है वो इस संदर्भ से अलग की बात है। ऐसे तो english के भी बहुत से शब्द हैं जिन को प्रतय्य मान कर प्रयोग किया जाता है जैसे :-<BR/><BR/>peremeter = pere + meter<BR/>हिन्दी में इस का स्वरूप होता "परि" शब्द <BR/>जैसे : परिभाषा, परिकथा .. इत्यादि<BR/><BR/>पर हम इस प्रसंग की बात ही नहीं कर रहे। सो अभी प्रतय्य उप्सर्ग विनम्रता से बक्श दिया जाये।<BR/><BR/>४. भाई राजीव, तुम कहो तो हम बिना कहे ही हार मान लें ? हारे को हरी कह कर खुश हो लें ?<BR/><BR/>ताल ठोकने की ज़रूरत नही है इधर : बात को समझो और स्विकारो। सिविकारो इस लिये क्योंकि यह सही है। वैसे अस्विकार भी करो तो उस से कुछ मुझे अधिक अंतर नहीं पड़ता। <BR/><BR/>अब आगे ....<BR/><BR/>उर्दू कुछ अलग है हिन्दी से<BR/>इस में आप अपने मन चाहे शब्द बना सकते है !<BR/>कोई शब्द कितना भी लम्बा हो सकता है. ऐसा भी हो सकता है कि एक पंक्ति में एक ही शब्द हो ! पर उस एक शब्द का आकार ५० या १०० अक्षरों जितना भी हो सकता है...<BR/><BR/>जैसे...<BR/>इबन-ए-मरियम <BR/>यानी मरियम का बेटा<BR/>"ए" अक्षर इस में संयोजक है<BR/>"मरियम का बेटा" ये ३ शब्द ना लिख कर इधर एक ही शब्द लिखा गया है "इबन-ए-मरियम " ... उर्दू भाषा में ऐसी फ़ैसीलिटी है, कुछ अन्य भाषाओं में भी है, पर हिन्दी में नही है।<BR/><BR/>अब इस प्रकार के कम्पोज़िट शब्दों में कहा गया है कि उर्दू के शब्द के साथ उर्दू का ही शब्द आये। <BR/><BR/>अभी हमने "रचना" के बाकी चहरों को तो निहारा भी नही है, पर आपने ये "गज़ल" का प्रसंग क्यों छेड़ा यह सु-स्पष्ट नहीं है। <BR/><BR/>वैसे ये गज़ल नहीं है ( पर हम शिल्प की अभी बात ही नहीं कर रहे ) सो हम इस विषय पर कुछ नहीं कहेंगे।<BR/><BR/>"रचना" शब्द का ही प्रयोग करेंगे। आपको यह रचना पढ़ कर आनंद आया बहुत खुशी की बात है। इस पर प्रतिक्रिया या इसका विरोध नहीं कर सकते हम और ना ही हमको करना चाहिये।<BR/><BR/>>> "आप मीटर में नाप नाप कर गज़लें न लिखें या दोहे, चौपाई, छंद न लिखें (आम तौर पर आप भी तय नीयमों में नही लिखते)" <BR/><BR/>भाई रंजन, ऐसा है .. "कोई नाप के ना लिखे" या "कोई जान बूझकर नापकर ना लिखे" या "कोई लिखने का प्रयत्न करे और ना लिख पाये" तीनो बातों में अंतर है। सो अजय के लिये यह कहना अनुचित सा लगता है।<BR/><BR/>अभी बहुत कुछ है कहने को ... पर हम पहले भी बहुत जगह इस बात पर बहस कर चुके है कि कविता किस को कहे, क्या शब्द प्रयोग करें..... सो संदर्भ से मैं, इस मंच पर नहीं भटकना चाह्ता। हम केवल "नैन" की ही बात करेंगे :)<BR/><BR/>६. अजय, तुम्हारा कहना ठीक है।<BR/>अब आशा है, "निगाह-ए-जाम" को तुमने भी माफ़ कर दिया होगा।<BR/><BR/>७. शैलेश , बड़ों ने कहा था कि "लिखने से ही लिखना आता है", सो लिखते रहो...... <BR/><BR/>रिपुदमन पचौरीरिपुदमन पचौरीnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-7643614763608733332007-06-12T02:41:00.000+05:302007-06-12T02:41:00.000+05:30Praudhokik vaadi yug ki utrkrash rachna. Is yug ka...Praudhokik vaadi yug ki utrkrash rachna. Is yug ka udgaar kuch chaar ek varsh pehle hua tha jab desh kaal vatavaan ki deevarein tod kar hindi kavita saste waale hastnirmit sokhta sadrashya pannon se nikal kar LCD Screen par chamkne lagee. is yug ki parichayak hai ye kavita, kavi ki unmuktata ki, evam tatkaleen vastavikta ki ghor parichayak................adbhut hote hue bhi lokpriya.Tame me I am tiredhttp://www.blogger.com/profile/11855875089657327710noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-63221284300873694132007-06-11T20:48:00.000+05:302007-06-11T20:48:00.000+05:30उनका तॊ आप जानें भैया पर लगता है हमें तरसाने में आ...उनका तॊ आप जानें भैया पर लगता है हमें तरसाने में आपकॊ मजा आता है<BR/><BR/>यकीन मानिए कविता पढकर मुहं में पानी आ गयासुनील डोगरा ज़ालिमhttp://www.blogger.com/profile/13066188398781940438noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-11214330544775548912007-06-11T20:44:00.000+05:302007-06-11T20:44:00.000+05:30Shailesh jibadhaibahut hi shandaar kavita likhi ha...Shailesh ji<BR/>badhai<BR/>bahut hi shandaar kavita likhi hai<BR/>lekin ek baat battaiye shaadi se pehle aap manaa kerte hai aur woh israar...ulti ganga behti hai kya ...ha ha ha ...lekin phir bhi bahut badhiya haiAnitahttp://www.blogger.com/profile/02829772451053595246noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-23801116380964294622007-06-11T20:11:00.000+05:302007-06-11T20:11:00.000+05:30शैलेश जी! आपने हंसने का अवसर दिया था ,मैं फ़ायदा न...शैलेश जी!<BR/> आपने हंसने का अवसर दिया था ,मैं फ़ायदा नहीं उठा पाया.ठा ठा करके अगर नहीं ,तो मंद-मंद मुस्कराया जा सकता था. पर खैर--<BR/><BR/>इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि जज़्बातों को ज़ाहिर करने की सहजता कवि को मिलनी चाहिये,शर्त--सम्प्रेषणीयता बनी रहे पाठक के साथ.<BR/>और केवल उर्दु-हिन्दीके संयुक्त प्रयोग ही क्यों,अन्य प्रादेशिक भाषायों के शब्द भी प्रयोग करने की उपादेयता देखी जा सकती है,पूर्व लिखित सहजता के साथ<BR/><BR/>आखिर सवैय्या,चौपाई आदि भी किसी भी भाषा मे रहकर भी सवैय्या या चौपाई ही रहती हैं,<BR/><BR/>सादर <BR/><BR/>प्रवीण पंडितpraveenhttp://www.blogger.com/profile/14379308096695326023noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-60640705419118774752007-06-11T18:18:00.000+05:302007-06-11T18:18:00.000+05:30बहुत ज्यादा संस्कृतनिष्ठ शब्दों में लिखि कविता तो...बहुत ज्यादा संस्कृतनिष्ठ शब्दों में लिखि कविता तो अपने भी पल्ले नहीं पड़ती और फिर आजकल इस तरह की कविताओं को कूड़ा कहने का फैशन भी चला है। हाँ एक बात है थोड़ी बहुत घालमेल ठीक है पर अति ना हो। कहीं भाषा इस तरह के प्रयोगों से एक दिन नष्ट ना होने लग जाये। इस बात का ध्यान भी आपको ही रखना है। <BR/><BR/>भाइ शैलेष जी मुझे तो कविता अच्छी लगी। आगे भी इन्तजार रहेगा।Sagar Chand Naharhttp://www.blogger.com/profile/13049124481931256980noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-73300243496752994342007-06-11T17:47:00.000+05:302007-06-11T17:47:00.000+05:30ह्म्म्म्म्एक बार फिर वही घिसी-पिटी बातों पर निरर्थ...ह्म्म्म्म्<BR/>एक बार फिर वही घिसी-पिटी बातों पर निरर्थक चर्चा<BR/>"समय नष्ट करने के सौ तरीके" में से एक यह भी है<BR/>सच कहूँ तो बहुत दुःख होता है कि कविता के मूल भाव की ऐसी तैसी कर हमारे प्रिय मित्र न जाने क्यों नियम,कानून में ही उलझ जाते हैं|हद तो तब हो जाती है जब कविता को मीटर, सेंटीमीटर, गज,फुट,इंच में नापा जाने लगता है|अरे यार, हास्य है तो हँस लीजिये....<BR/>कवि की स्वतन्त्रता तो जग प्रसिद्ध है...आखिर ये मीटर, बहर भी तो पहली बार बने होंगे कभी? क्या उससे पहले कविता नही थी? हाँ, ये अवार्ड,पुरस्कार जरूर अब बने हैं<BR/>ठीक है, नये प्रयोग हमेशा हर क्षेत्र में आवश्यक हैं इन्हें रोक कर कविता के विकास मे रोडा अटकाने का काम क्यों किया जा रहा है|नियमबद्ध लेखन मात्र मूल भाव की हत्या करके ही सम्भव है और यह उनके लिये ही आवश्यक है जिन्हें अपने लेखन को सराहे जाने की चिन्ता है|नये प्रयोग करने में आखिर हानि ही क्या है...यदि कोई सुप्रसिद्ध कवि कोई नया प्रयोग करे तो हम सभी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते नहीं थकेंगे...<BR/>कबीर ने अपने दोहे लिखे तो हमारे महान विद्वानों ने उनकी भाषा को "खिचडी" भाषा का नाम दे दिया क्योंकि पल्ले नहीं पडी तो क्या करते|अब बेचारे पूज्य कबीर जी को तो अपनी सीधी सादी बात कहनी थी सीधी सादी भाषा मे सो कह दी जिसे पढना हो पढे जिसे न पढना हो न पढे,लेकिन दर्शन इतनी सरलता से भी लिखा जा सकता है ये तो आज के सुधी कवियों के भी बस का नहीं....स्वर तेज हो रहा है क्षमा करियेगा ...लेकिन बाहर निकलिये भाई इन सब बातों से और ऐसे प्रयोगों को प्रोत्साहित करिये<BR/><BR/>कविता ने मुझे खूब हँसाया...कविता अपने उद्देश्य मे सफल है<BR/>बधाई शैलेश जी<BR/><BR/>सस्नेह<BR/>गौरव शुक्लGaurav Shuklahttp://www.blogger.com/profile/12422162471969001645noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-23760061918181514972007-06-11T17:41:00.000+05:302007-06-11T17:41:00.000+05:30शैलेष जी,मैंने जो लिखा था, वह आपके द्वारा प्रयुक्त...शैलेष जी,<BR/>मैंने जो लिखा था, वह आपके द्वारा प्रयुक्त शब्द से श्रेष्ठ कुछ लिखने का प्रयास नहीं था। मैं केवल यह कहना चाह रहा था कि प्रयुक्त पद की जगह और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था। निगाह-ए-ज़ाम को तो मैं पहले ही अर्थ में अंतर के चलते नकार चुका था। सम्प्रेषणीयता की बात करें तो जब रिपुदमन जी गलती कर बैठे तो किसी अन्य सामान्य पाठक से यह गलती होना, संशयपूर्ण न होगा।<BR/>एक बात और शैलेष जी, इस टिप्पणी में आपने टंकण की गलतियाँ काफी कर दी हैं। शायद जल्दबाजी में। एक शब्द का विशेष उल्लेख करना चाहुँगा, आपने 'अल्पज्ञयानता' का प्रयोग किया है जबकि सही शब्द 'अल्पज्ञता' है। और हाँ, आपकी रचना के पीछे किसी व्यक्ति विशेष को मैं तलाश नहीं कर रहा था, वो महज़ एक मजाक था। कृपया अन्यथा न लें।अजय यादवhttp://www.blogger.com/profile/12784365227441414723noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-2989007708183638182007-06-11T17:27:00.000+05:302007-06-11T17:27:00.000+05:30अच्छी लगी आपकी कविता.........टेक्निकेलिटी का हिसाब...अच्छी लगी आपकी कविता.........<BR/>टेक्निकेलिटी का हिसाब तो मुझे पता नहीं,पर यूं कविता <BR/>पढ़ने मे मज़ा आया.........कुछ पुराने दिन याद आ गये।<BR/>बहुत खुब!!!!priya sudraniahttp://www.blogger.com/profile/04044163984286818353noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25230923.post-80851449326425246952007-06-11T17:25:00.001+05:302007-06-11T17:25:00.001+05:30अच्‍छी कविता है, मै राजीव जी से सहमत हूँ पर मै यह ...अच्‍छी कविता है, मै राजीव जी से सहमत हूँ पर मै यह तभी कहूँगा जब आप बताऐगें वो कौन है ? :)mahashaktihttp://www.blogger.com/profile/17276636873316507159noreply@blogger.com