जब पहली बार मैंने ग़ज़ल लिखी
जैसा कि आपलोग अब तक मुझे पढ़ते आये हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता होगा कि मैंने मात्र अतुकान्त कविताएँ ही लिखी है। मैं अपने हॉस्टेल में भी इस कारण दोस्तों की आलोचनाएँ सुनता रहा। फिर पिछले वर्ष प्रथम बार मैंने कुछ तुकान्त लिखने का प्रयास किया। अब मालूम नहीं कि इसने ग़ज़ल का रूप लिया है या किसी और छन्द का? आपलोग ही तय करें, और मार्गदर्शन दें।
आँखें पथराई सी
जो तू आई कल शाम, मेरे आशियाने में,
मैंने अब तक रात को सुबह होने न दिया।
तेल के दीये तो कब के बुझ चुके होते
मगर खून-ए-जिगर ने उन्हें बुझने न दिया।
हुस्न वालों ने लगा रखी है इक आग बेवफ़ाई की
झूलसा तो हूँ मगर वफ़ा-ए-यार को जलने न दिया।
इन राहों ने निगले हैं कई रहगुजर
बना लिया हूँ घर इस पहाड़ी पर
किसी खूनी रास्ते को घर से गुजरने न दिया।
इन किताबों ने ज़ुदा किये हैं, हमको अपनों से
जब भी दादा ने उठाई कलम, कुछ लिखने न दिया।
रोज़ करते हैं फ़ोन पर वादा, वो आयेंगे हमारी मय्यत पर
पथरा गई हैं आँखें, मगर 'शैलेश" उन्हें झपकने न दिया।
लेखन-तिथि- २३ फ़रवरी २००६ तद्नुसार विक्रम संवत् २०६२ फाल्गुन कृष्ण पक्ष की दशमी।