गुरुवार, 3 मई 2007

क्या डीटीसी का घाटा कम होगा?

डीटीसी पाँच सालों से घाटा झेल रही है
केवल 'पास' वाले यात्रियों को ठेल रही है।

जब इनके कंडक्टर
प्राइवेट वालों से घूस लेते हैं
हाथ देने पर भी
स्टैंड बन बिना रुके, फूट लेते हैं।

प्राइवेट बसें ठूँस-ठूँस के भरी होती हैं
डीटीसी बसें मुँह बाएँ खड़ी होती हैं।

इनमें जबकि केवल 'दो' वाले चढ़ते हैं
'दो' में चढ़कर 'पाँच' की दूरी बढ़ते हैं।

बस के गंतव्य तक पहुँचने की, सरकार गारंटी नहीं लेती
चलती बस से उतरते, आपकी सलामती की वारंटी नहीं लेती।

नए यात्री को ये ठीक जगह उतारते नहीं
कहाँ-कहाँ जाएँगे जब ये पुकारते नहीं।

क्यों महँगाई के डंडे में
तेल लगाते जा रहे हो?
अपनी करनी का फल ख़ुद भी चखो,
क्यों भारत की नैया
डुबाते जा रहे हो?

किराया बढ़ाकर सरकार
अपनी कमज़ोरी छुपाना चाहती है।
या यूँ कहें कि
प्राइवेट का मुनाफ़ा बढ़ाना चाहती है।

पानी सर के पार हो जाए
अब इसी का इंतज़ार है
मिलकर सत्ता बदल दो
समय की यही दरक़ार है।


लेखन-तिथि- ३ मई २००७ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६४ प्रथम ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा।

17 टिप्‍पणियां:

रंजु ने कहा…

बिल्कुल सही नक़्शा खीच दिया अपने अपने लफ़्ज़ो में .....

बस के गंतव्य तक पहुँचने की, सरकार गारंटी नहीं लेती
चलती बस से उतरते, आपकी सलामती की वारंटी नहीं लेती।
नए यात्री को ये ठीक जगह उतारते नहीं....

बहुत सही ..


पानी सर के पार हो जाए
अब इसी का इंतज़ार है
मिलकर सत्ता बदल दो
समय की यही दरक़ार है।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

बहुत सुन्दर व्यंग रचना के माध्यम से आपने हकीकत बयां करी है। वैसे अमूमन सभी राज्यों के एस टी का यही हाल है।
कभी कभार इस तरह की व्यंग और हास्य कवितायें भी लिख दिया करें।
सत्ता बदल देने से कुछ नहीं होगा, भूत मरेगा और पलीत जाग जायेगा।

sunita (shanoo) ने कहा…

वाह शैलेश क्या खूब व्यंग्य किया है,..ये भी लगता है आपका अनुभव ही है जो आपने कविता के रूप में लिखा है,..मगर सत्ता बदलने से भी कुछ नही हो पायेगा । फ़िर भी प्रयास किया जा सकता है,..
सुनीता(शानू)

ग़रिमा ने कहा…

मै तो जिस इलाके से आयी हूँ वहा बस नही सिर्फ बस्स होती है एक बार चढ ले तो दूबारा बस का नाम नही लेंगे... खिडकी पर लटके आदमी, दरवाजे से लटके आदमी, और अन्दर भीड इतनी कि कोई नया मुसाफिर चढ जाये तो बेचारा कुचला हूआ ही बाहर आयेगा... पूराने लोग तो फिर भी बाहर आ ही जाते हैं.. और किराया वो तो अपनी मर्जी से कुछ भी लिया जा सकता है, 15 की जगह 50 भी कहा जा सकता है।

अब क्या कहूँ बस कि तारीफ मे.. बस ही करती हूँ

satish ने कहा…

kafi dino baad shailesh bharatwasi ki kavita padhne ka saubhag prapt hua hai.....ab mai kya tarif karu kyon ki inki har kavita inke tarif me ek aur kari jor jati hai...well done bharatwasi ...umid hai aap ki kavita ka saar dtc ke karmchariyon tak pahuche

suyash ने कहा…

shailesh ji,
aapki kavitaon ka to main college ke time se hi fan tha par shaayad aajkal aapka lekhan apne pure shabab par hai........jaise waqt ne aapke kalam ko aur taakat pradaan kar di ho......
ek saamyik vishay ko jitne sarlta aur sateekta ke saath aapne ubhara hai vo kabile taarif hai...... badhai sweekar karein

Sanjiv Verma Salil ने कहा…

mere vichar dtc bus wali kavita k lie

na teri he
na meri he
hamari he ye D.T.C.
nagad ghata uthati he
udhari he ye d.t.c.
na lagta break
jhatka lag raha passangaro ko yar
na bajta horn
bajta teen-tappar
jese ho sarkar!
ye conductor
zra se bhrasht he par
kam he mantry se|
hai mehnat chor hum sab to
na ho kyo chor conductor?
sabhi ko swarth he pyara
to kya ho driver nyara?
hamare hi sareekhe
karmchari he ye sarkari|
chalate hei gale par
khud hi apne
roz do dhari |
na kosen,
dosh mat den,
dosh apne
khud hi hum dekhe
na khote siddh ho hum
ishwar ya dunia k lekhe|
ticket bin----
chade na bus par
chalaye na koi chakkar
ye dekhe-
poornima na koi
amawas si andheri he|
na teri he, na meri he|
hamari he...

गिरिराज जोशी "कविराज" ने कहा…

:)

अपने आस-पास के हालात को कविता का रूप आप बखूबी दे देते हैं, हाल ही में आपने पानी की समस्या को विषय बनाया था और अब डीटीसी बसे चपेट में आ गयी :)

मैं भी दिल्ली में रहा हूँ 4-5 महिने, मुझे तो डीटीसी बसे प्राइवेट बसों से ज्यादा सुरक्षित और सुविधाजनक (क्योंकि बैठने को सीट आराम से मिल जाती है) प्रतित हुई मगर यह करीब 2 वर्ष पूर्व की बात है, आज के हालात ज्ञात नहीं।

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

सामायिक विषयों को बखूबी लपेट रहे हैं आप... हास्य के पुट के साथ.....लगे रहिये....मजा आता है ऐसी रचना पढने में

avanish ने कहा…

satta badal do agar na hota toh aur achhi hoti. sattaa ke sach ka koyi bhi aayaam agar kisi kavita main parilaxit ho toh wahi kafi hai..kavi ko nirnayak hone se bachna chahiye..

priya sudrania ने कहा…

kavita abhut achchi lagi mujhe
apne sahar jaipur ki yaad aa gayi mujhe....yahan to bus mein ghumna bhi itna aaramdayak hota hain ki lagta hi nahin bus yatra kar rahe hain......adat jo rajasthan roadways ki padi hui hain.....
aap likhte bahut achcha hain...bahut khub

shailesh ने कहा…

kya baat hai shaileshji, kya upma di hai apne.Mein to mehsus kar sakta hu, kyoki maine khud DTC bus ko ghata lagaya hai.Delhi university ka student 3 saal tak tha par pass 5 saal chalaya hai.

great work!

Asheesh Dube ने कहा…

शैलेश जी, पानी बचा ही कहां है... खैर इंतजार करते हैं....पानी सर के पार हो जाए

Addy ने कहा…

Hello Shileshji it' was a wonderful poem......as i know the condition of buses n others transports.....infact there is a huge problem but u can write such a real image in your words that why should we trouble in thoses places...thanks for your amezing poem in correption....

Regards,
Aditya

anju ने कहा…

aapne bilkul thik kaha hai shailesh ji
yaa DTC buses ka yehi haal hai waise maine 1ya 2 baar hi safar kiya hai bus se aisa hi hai
likhte rahiye
accha likha hai

Anuj ने कहा…

hello sir, today is 16th of august 2010. you ask for "anosh" word very early before( Nov 5 2006, 12:06 pm), it is a hindi word as well as also a farasi word which mean no-man, or AGYAT.
ANUJ

Anuj ने कहा…

http://translate.google.co.in/translate?hl=hi&langpair=en|hi&u=http://www.birthvillage.com/Name/Anosh