शनिवार, 19 मई 2007

हमारा इंडिया

हम तो आज भी अंग्रेज़ों के अधीन हैं
क्योंकि भारत 'इंडिया' में विलीन है।

भारतवर्षोंन्नति हो भी तो कैसे? जब
हर कोई पलायन को तल्लीन है।

कैसे जमा हो बिजली, पानी, सड़क का खर्च?
जबकि हम टैक्स भरने के प्रति उदासीन हैं।

कैसे बनाओगे दिल्ली को लंदन जैसा?
जब यहाँ आधी बस्तियाँ मलीन हैं।

हर दुकानदार है करा रहा यहाँ बालमज़दूरी
यह जनाते हुए, अपराध यह संगीन है।

एड्स पर पूरा अंकुश आख़िर लगे भी कैसे?
जबकि हज़ार पर नौ सौ तैंतीस ख़वातीन हैं।

क्यों बढ़ाते जा रहे हो संतानों की फ़ौज
न खाने को अन्न है, न रहने को ज़मीन है।

शब्दार्थ०-
भारतवर्षोंन्नति- भारत देश की उन्नति, ख़वातीन- नारी, महिला, स्त्री, लड़की

लेखन-तिथि- २१ नवम्बर २००६ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६३ मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा।

23 टिप्‍पणियां:

Raja Babu ने कहा…

Desh ki aawaz ko jan jan tak pahoonchane ke liye aap jaise jeevant kaviyon ki jaroorat hain.

keep it up shailesh ji.
i am proud of you to devote your valuable time on behalf of our nation.

Thanx and Regards
Rajeev Pandya

Addy ने कहा…

Dear Shileshji what's thinking u hv,... such a wonderful thoughts....Hindustaniyon ko uoocha sunaiye deta hai.....aap ki yeh Kavita ek "Bramashtra" Hai" Jisski goojeh chaaro taraf hai.....
i really apprecited to your feeling of our nation....

With Warm Regards,
Aditya

yogesh samdarshi ने कहा…

लगता है देश के हालातों से आप बडे गमगीन है
पर मेरा माना है कि बात एकदम महीन है

जो देख दो हजार पहले था वैसा अब नही है
और आगे भी अब जैसा नही रहेगा पूरा यकीन है

आपकी कविता वासतव में एक दम अच्छी है
मांसाअल्लाह सोच भी ताजा तरीन है.

बधाई

janmejay ने कहा…

नमस्कार शैलेश जी!
आपकी यह कविता वाकइ बहुत अच्छी है।लोग सच्चाई जानते हुए भी उससे मुह मोरते हैं,आपकी यह कविता उन्हें फिर से यथार्थ से परिचय करवाने का सामर्थ्य रखती है।आज भारत को भारतवर्षियों की अत्यंत आवश्यकता है,क्योंकि आज यहाँ ज्यादा इंडियन हैं और भारतवासी बहुत कम।

धन्यवाद!

sunita (shanoo) ने कहा…

शैलेश भाई लगता है आप सच्चे भारतवासी है। जैसा नाम वैसा काम,..आपकी हर कविता जनता में नव-चेतना पैदा करती है,..मै चाहती हूँ आपकी आवाज़ बुलन्दियों को छुए,..
आपकी ये कविता भी समाज पर करारा प्रहार करती है...
बहुत-बहुत बधाई...कविवर..:)
सुनीता चोटिया (शानू)

Upasthit ने कहा…

कविता की हर दूसरी पंक्ति से वैचारिक मतभेद है मुझे...
१) भारत इंडिया मे विलीन नहीं है, इस फ़ैट है ही नहीं कहीं, इंडिया ही है बस.भारत का होता है जी ?
२) हर कोई पलायन नहीं कर रहा, प्रगति पथ पर अग्रसर होना चाह्ता है.
३) अमा क्या बात करते हो, टैक्स के लिये उदासीन? जाने कितनी प्लानिंग कितनी जोड तोड जुगाड करनी पडती है टैक्स के लिये ही..ब्लैक मनी को वाइट कर सकना , उदासीनता से हो सकता है ? कमाल करते हो..
४) डार्विन चाचा का नाम सुने हो ना ?
५) आयें...सही कहो ? एड्स का रीजन ?
६) ये तो अपका सोंचना है, बच्चे तो भगवान की अमानत, इनायत है...

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

भैया भारतवासी, अब समझ मेँ आया आप की सेहत न बनने का राज... रात दिन देश के बारे मेँ चिन्ता जो करते रहते है,,
कहाँ कहाँ से चुन चुन कर सवाल खडे किये हैँ... अपुन के पास कोई जबाब नही हैँ.. :)

रंजू ने कहा…

कैसे बनाओगे दिल्ली को लंदन जैसा?
जब यहाँ आधी बस्तियाँ मलीन हैं।

हर दुकानदार है करा रहा यहाँ बालमज़दूरी
यह जनाते हुए, अपराध यह संगीन है।

sahi aur sundar pryaas hai aapka

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता ! अच्छे प्रश्न भी उठाए हैं ।
घुघूती बासूती

manya ने कहा…

बहुत सच्ची और खरी बातें कहीं हैं आपने.. आशा है लोग सिर्फ़ पढेंगे ही नहीं सोचेंगे भी.. तभी शायद नवनिर्माण होगा..

Asheesh Dube ने कहा…

बहुत जबरदस्‍त कविता है, शैलेश जी। जितनी तारीफ की जायेगा कम है। लुत्‍फ भी है, तल्‍खी भी।
भारतवर्षोंन्नति हो भी तो कैसे? जब
हर कोई पलायन को तल्लीन है।
यह शेर पढ़कर भारतेन्‍दु की याद आ गयी।

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' ने कहा…

भारतवासी जी,
आप कविता के सैट पैटर्न से ऊपर बढकर, जनहित और समाज कल्याण की बात करते है।
आपकी 'दो बूँद' वाली कविता ने भी इसी तर्ज पर प्रभावित किया था।
सवाल तो बहुत सारे हैं, पर बढा सवाल कि आप की तरह कितने लोग उन सवालों को लेकर गंभीर है......?

Divine India ने कहा…

हम तो आज भी अंग्रेज़ों के अधीन हैं
क्योंकि भारत 'इंडिया' में विलीन है।

कैसे बनाओगे दिल्ली को लंदन जैसा?
जब यहाँ आधी बस्तियाँ मलीन हैं।

शैलेश जी,
अगर आप खुद दोनों पंक्तियाँ को ध्यान से नजर करें तो एक तरफ आप इंडिया में भारत को विलीन मान रहे हैं दूसरी तरफ आपकी मानसिकता विदेशी सभ्यता की गस्त लगा रही है…।भारत मात्र भारत बन जाए यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी…।
रही कविता की बात तो यहाँ सांसों को पकड़ कर रखा है। मेरा मात्र यहाँ वैचारिक मतभेद है कविता पूरे सुर में है… धन्यवाद!!!

परमजीत बाली ने कहा…

उपदेशात्मकता से परिपूर्ण आप की रचना एक अच्छा संदेश दे रही है। सुन्दर प्रयास है\बधाई।

priya sudrania ने कहा…

शेलेष जी,

अच्छी कविता लिखी आपने.........पर ऐसा लगा मानो कुछ अधुरा सा रह गया........
कविता मे पुछे गए सवाल पेशानी पर बल और दिमाग को झकझोरने वाले तो है...
परन्तु अंत मे ऐसा प्रतीत होता है मानो अचानक एक जागरूक नागरिक प्रशनों की बोछार
करते करते थक कर रुक गया.......मतलब यह की एक प्रभावी अंत नहीं मिला इस कविता को।
आपकी कई कविताए पढ़ने का मोका मिला है .....
१ मेरे अभिष्ट
२ दो बूदँ की कहानी
३ और कुछ नहीं
.................................

उनसे यह कविता मुकाबले मे पीछे रहती है।

प्रिया

Tushar Joshi, Nagpur (तुषार जोशी, नागपुर) ने कहा…

प्रिय शैलेश जीं,

आपकी कविता नये नये सवाल लेकर आई है। कविता के भाव और कल्पना बहोत अच्छी है। गज़ल नहीं कह पाऊंगा हालांकि गज़ल बनने के बहोत करीब है।

divine india से मै सहमत हूँ

तुषार जोशी, नागपुर

ऋषिकेश खोङके "रुह" ने कहा…

शैलेश जी बहोत ही सुंदर कविता है, राष्ट्र की दशा का सटिक चित्रण है | इस प्रकार की कविता शायद पाठको को कुछ सोचने पर मजबुर करे और यदि ऐसा होता है तो ये कवी की विजय है |
ठंडी पडी है आग बगावत की सीनो मे |
लानी होंगी इंकलाब के आग़ाज़ की किताबें ||
खोये ही रहोगे कल मे की आँखे भी खोलोगे |
खुली है सामने तुम्हारे आज की किताबें ||

tanha kavi ने कहा…

बहुत हीं अच्छी रचना है शैलेश जी। सच्ची बात बयां करती है।
हर दुकानदार है करा रहा यहाँ बालमज़दूरी
यह जनाते हुए, अपराध यह संगीन है।

एक गंभीर बात उठाई है यहाँ आपने।
बधाई स्वीकारें।

gaurav ने कहा…

This is a very nice poem shailesh..but as a responsible youth our duty us not only finding the weak points but also provide the proper way to tackle them...anyways nice poem and criticisation....now i want that in solution of this in the next poem...

Ram Kumar ने कहा…

yah aawaz sunee jaye va iske hal milna shuru ho to hume phal mil jaye.aisa ek ma ka aasheerwad hai.

ANUPAMA CHAUHAN ने कहा…

AACHA LIKHA HAI AAPNE.....AAPKE TOPICS HAMESHA SOCIETY RELATED HOTE HAIN.....BAS EK BAAT JO DIVINE INDIAJI NE KAHI HAI US PAR GAUR KAREN....BAAKI SAB EK DUM MAST HAI.....KEEP WRITING

Yatish Jain ने कहा…

"हम तो आज भी अंग्रेज़ों के अधीन हैं
क्योंकि भारत 'इंडिया' में विलीन है।"
bahut acche, hamare news channel ke naam ko hi lelo, NDTV India, India Tv

divya ने कहा…

achchi kavita hai.....hinglish kavita pasand aayi....bahut khoob....