मंगलवार, १३ जून २००६

रति और काम

कब से लड़ रहे थे वे दोनों
कोई किसी से कम नहीं था
जो लोग घरों से बाहर थे
उनका झगड़ना देख भी पा रहे थे।
वैसे संकेत सुलभ थे
पर व्यक्ति का स्वार्थ
कहाँ देख पाता है सबकुछ!
रति और काम को इनसे क्या मतलब
अरे! ये हों ना हों
उनके कार्य का प्रयोजन नहीं खत्म होता
झगड़ा करते हैं वे दोनों
और
अनुकूल बनते हैं उनके लिये
झगड़ते हैं तो बदरी भरा आकाश आनन्द देता है
और जब इनका सर्वश्व नष्ट होता है
तो वर्षा ऋतु आती है।
कामः "कितना अच्छा है ना देवि!
ईश्वर हमारे कार्य से प्रसन्न होकर
शंखनाद के उपरान्त
मृदुजल को स्वाहा कर रहे हैं"
रतिः "हाँ स्मर! अब इसी के लिये
परमेश्वर ने भेजा है, तो उन्हें करना तो पड़ेगा ही"
कामः "चलो,पुनरायोजन करें, देखो!
नभ कितना स्वच्छ हो चला है,
सम्भवतः हमारा स्वागत करने आया है चाँद"
रतिः " हाँ मयन, देखो ना हमें देखकर तारे किस तरह
मुस्कुरा रहे हैं"
कामः "कल देखा था तुमने?
सुबह-सुबह
अरूणदेव हम में नयी स्फूर्ति जगाने के लिये
समय से पहले निकल आये थे"
रतिः "हाँ, सब ठीक रहा तो
हमारे वंशज इस जगत पर राज करेंगे"
कामः " हाँ, विलम्ब ना करो तो अच्छा है
अतिशीघ्र प्रस्तुत हो जाओ"
एक नव अनुकूल आयोजन हो चला है
धीमी-धीमी वर्षा ऋतु की फुहार
ऊर्जाहीन हो चले हैं दोनों
मेघों के पास भी कुछ नहीं बचा लुटाने को।


लेखन तिथिः १८ अगस्त २००४

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