मंगलवार, 19 सितंबर 2006

प्रेम-पुष्प

प्रिये,
असमंजस में डाल दिया है तुमने,
इतना आसान नहीं है
भावनाओं को शब्दों में पिरोना
इतना सरल नहीं है
उड़ते बादलों को पकड़ना।
बस इतना जा लो
मन कहीं नहीं लगता आजकल
कभी तितली, कभी झरने की तरह
इठलाता रहता है इधर-उधर।
बदल गयी है दुनिया मेरी
अब कुछ पुराना नहीं लगता
जीवन को गति मिल गयी है।
कहते हैं ना मंजिल तक पहुँचना
आसान हो जाता है
जब हमराह साथ में हो।
बस इतना जा लो
नहीं रहा कुछ भी मेरा
छोड़ दिया है सबकुछ
लम्हों के आसरे।
शायद सिमट गया है
सम्पूर्ण अस्तित्व तुम्हारे में ही
बढ़ गया है श्वासों का त्वरण
घटने लगी है दर्शन की गहराई।
देखने लगा हूँ सपने
करने लगा हूँ प्रयत्न
कि कर सकूँ साकार।
हटा दिया है प्रत्येक आवरण
खोल दी है दिल की किताब
सालों की मैल थी उनपर
फेरने लगा हूँ उँगलियाँ।
अब नहीं ज़रूरत समझता
मकड़ी के जालों का घर में
क्योंकि मिल गया है कवच
अटूट, अविखण्डित तुम्हारे जैसा।
नहीं डर लगता मर जाने से॰॰॰॰॰
और कुछ जानना है तो
महसूस करो दिल की धड़कनें
पावोगी॰॰॰॰॰॰॰॰॰
कि सबकुछ तुम्हारा है।


लेखन-तिथि- दिनांक ८ नवम्बर २००४ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६१ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी।

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत अच्छा

गिरिराज जोशी ने कहा…

बहुत अच्छा...

हार्दिक शुभकामनायें।

anupama chauhan ने कहा…

Very beautiful words and feel...really a romantic stuff

keshav ने कहा…

सभी कविताए पसंत आगई।