बुधवार, 11 अक्तूबर 2006

प्रेम-पुष्प-३

प्रिये,
नहीं समझ पाता मैं
रिश्तों का समीकरण
सम्बन्धों की तीव्रता
बस मिलते जाते हैं संयोग
बदलता जाता है सबकुछ
चला जा रहा था
न जाने किस दिशा में
मिल गयी चौराहे पर खड़ी तुम
दिखा दिया मार्ग
चमकने लगे भविष्य-चिन्ह
अब न अंधेरों का साम्राज्य है
और न कोई आवरण
हो गया है सुगम्य प्रत्येक साध्य
संसार एक आवृत्त था
बन गया है व्यास वो भी परिधि से
हो गया है उपजाऊ ह्रदय का सम्पूर्ण क्षेत्र
आवश्यक और अनावश्यक
सबको मिलने लगा है उर्वरक
कुछ पौधौं में फल भी लगे हैं
परन्तु डर लगता है क्योंकि
फल पक के गिरते भी हैं
नीचे की तरफ।


लेखन-तिथि- ३ दिसम्बर २००४ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६१ मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की षष्ठी।

9 टिप्‍पणियां:

गिरिराज जोशी ने कहा…

"संसार एक आवृत्त था
बन गया है व्यास वो भी परिधि से
हो गया है उपजाऊ ह्रदय का सम्पूर्ण क्षेत्र"


प्रेम का वर्णन इस रूप में भी हो सकता है???

सच कहूँ तो शैलेशजी आपके प्रेम रस का रसपान करने के लिए हमें इसे ६ बार पढ़ना पड़ा,
मैं तो हेरां हूँ कि आपने शब्दो का चुनाव कैसे किया होगा?

आपके शब्द-चुनाव और भाव व्यक्त करने का तरिका आपके ऊँचे कद को दर्शाता है।

मैं असमंजस में हूँ कि क्या सामान्य पाठक आपके शब्दों में छुपी भावनात्मक गहराई को समझ पायेगा?

बहुत ? मार्क लगा दिए, माफ कीजिएगा।

शैलेश भारतवासी ने कहा…

इतनी भी ऊँचाई मत दीजिए कि वहाँ से गिरने के बाद हड्डियों का भी नामो-निशाँ ना बचे।

संजय बेंगाणी ने कहा…

प्रेम के रेखागणित की कमाल अभिव्यक्ति हैं.

बेनामी ने कहा…

शैलेश जी,
प्रेम की तीनो मोतियो को वास्‍तव मे आपने बडी सुन्‍दरता से पिरोया है। प्रेम शब्‍द का अर्थ बहुत कठिन/सरल है। मेरे लिये तो कठिन ही है आज तक मै एक भी रचना प्रेमाधारित नही कर सका हूं। प्रेम पुष्‍पो की लढिया बहुत ही सुन्‍दर है। आगे प्रेम के मोतियो इन्‍जार रहेगा।

Kavinder KUmar ने कहा…

हैलो शैलेश भाई, मैं तो सिर्फ नाम का कवि हु,मैं बता नहीं सकता कि आपकी कविता कितनी अच्छी(यार explain karne ke liye word nahi h), मैं तो बस ये जानता हू कि जो कविता दिल के तारों को झंझोर दे , वो ही कविता मुझे अच्छी लगती ह।
" खुदा तुम्हे वो ऊँचाई दे, जहाँ से कम से कम जमिन् तो दिखाई दे"......................................................................................................................................................... लिखते रहो :)


With Best Wishes
कविन्द्र कुमार

Medha Purandare ने कहा…

Main Giriraj ji se sahmat hun. Muze bhi do bar padhni padi,tab jake thodi samajhmein aayi hain.

Aapke shabdon mein weight bahot hai,parantu mera khayal hai,PremPushp najuk hone ke karan kathin shabdonka istemal jarur nahi hain. Next time try soft and easy words. Ofcourse, aapki marjee.

बेनामी ने कहा…

aapka jawab nahi bhai

dil khush ho jata hai jab aapki kavita padhta hu

ur really superwarb

ranju ने कहा…

bahut hi sundar bhaavo se saji kavitaa hai ,,itna sundar likha hua dil ko chu gaya..

anupama chauhan ने कहा…

again a beautifull presentation
चमकने लगे भविष्य-चिन्ह
अब न अंधेरों का साम्राज्य है
और न कोई आवरण

हो गया है उपजाऊ ह्रदय का सम्पूर्ण क्षेत्र
आवश्यक और अनावश्यक

keep writing