शनिवार, २४ जून २००६

अलग पहचान

आज उसकी बातों से
फिर काँपा था मन,
जब से पत्र पढ़ा है
मन कहीं नहीं ठहरा।
क्या जबाब दूँ उसके
सवालों का?
कैसे समझाऊँ उसे
कि उतना ही व्यथित मैं हूँ!
क्या करूँ मैं ऐसा
जिससे वो अतरंगित हो जाये!
कुछ नहीं कर सकता मैं
ऐसा लगता है
कि बस
दरिया के किनारे खड़ा होकर
लहरों का हलचल देख सकता हूँ।
बस देख रहा हूँ कि
वे अब द्वीप पर चमकते पत्थरों
को अपने रंग में रंग रही हैं।
देख सकता हूँ बस इतना कि
रेतों पर पड़ी कश्तियों को भी
अपने में समाहित कर रही हैं।
लेकिन मैं कैसे कह सकता हूँ
कि मैं यह सब देख रहा हूँ?
अरे! उसे समझना चाहिए
पानी सर के ऊपर आ चुका है।
बस मैं निकलने के लिए
हाथ पैर मार रहा हूँ।
निकल नहीं पाऊँगा
इसलिए
सुनी-सुनायी बातें बताकर,
सुनाकर,
अपने में सिमटकर,
भय को भगा रहा हूँ।
कैसे बताऊँ उसे
मैं भी तो डर गया हूँ,
या यह कहूँ कि मर गया हूँ।
अरे, इतिहास तो मैंने भी पढ़ा था
हाँ, कुछ वैसा ही मैंने भी अनुभव किया था।
अपने से ही मैंने भी पूछा था
"क्या मैं नया भारत देख पाऊँगा?"
तब से बस इंतज़ार ही कर रहा हूँ।
यह सत्य है कि मैं खुद
कुछ नहीं कर रहा हूँ।
बस सोचे जा रहा हूँ
कि सबसे अलग एक पहचान बनाऊँगा।
बना भी लिया है
तभी तो दुनिया कहती है
न जाने कब से
'इसने' अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया
और कहता है
मरते दम तक शायद
यह उससे नहीं हो पायेगा।

(अपने प्रिय मित्र मनीष 'वंदेमातरम्' का पत्र पाने के बाद)

लेखन तिथिः १४ फरवरी २००४ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६० फाल्गुन कृष्ण पक्ष की नवमी।

मंगलवार, १३ जून २००६

रति और काम

कब से लड़ रहे थे वे दोनों
कोई किसी से कम नहीं था
जो लोग घरों से बाहर थे
उनका झगड़ना देख भी पा रहे थे।
वैसे संकेत सुलभ थे
पर व्यक्ति का स्वार्थ
कहाँ देख पाता है सबकुछ!
रति और काम को इनसे क्या मतलब
अरे! ये हों ना हों
उनके कार्य का प्रयोजन नहीं खत्म होता
झगड़ा करते हैं वे दोनों
और
अनुकूल बनते हैं उनके लिये
झगड़ते हैं तो बदरी भरा आकाश आनन्द देता है
और जब इनका सर्वश्व नष्ट होता है
तो वर्षा ऋतु आती है।
कामः "कितना अच्छा है ना देवि!
ईश्वर हमारे कार्य से प्रसन्न होकर
शंखनाद के उपरान्त
मृदुजल को स्वाहा कर रहे हैं"
रतिः "हाँ स्मर! अब इसी के लिये
परमेश्वर ने भेजा है, तो उन्हें करना तो पड़ेगा ही"
कामः "चलो,पुनरायोजन करें, देखो!
नभ कितना स्वच्छ हो चला है,
सम्भवतः हमारा स्वागत करने आया है चाँद"
रतिः " हाँ मयन, देखो ना हमें देखकर तारे किस तरह
मुस्कुरा रहे हैं"
कामः "कल देखा था तुमने?
सुबह-सुबह
अरूणदेव हम में नयी स्फूर्ति जगाने के लिये
समय से पहले निकल आये थे"
रतिः "हाँ, सब ठीक रहा तो
हमारे वंशज इस जगत पर राज करेंगे"
कामः " हाँ, विलम्ब ना करो तो अच्छा है
अतिशीघ्र प्रस्तुत हो जाओ"
एक नव अनुकूल आयोजन हो चला है
धीमी-धीमी वर्षा ऋतु की फुहार
ऊर्जाहीन हो चले हैं दोनों
मेघों के पास भी कुछ नहीं बचा लुटाने को।


लेखन तिथिः १८ अगस्त २००४

बुधवार, ७ जून २००६

सिगरेट

सिगरेट!
कुंठे की चिमनी
जलती-बुझती चिंगारी
निगलती जाती है सबकुछ
बड़वानल के सादृश्य
उसके पास भी अब बहुत कुछ
नहीं बचा
कितने दिन हुये
इस भस्म से दोस्ती के!
क्या साथ देती है
अपने में समाहित करके!
जब से मिली है
रूतबा बन गया है
समाज में
लोगों की दया
मुफ़त में मिलती है
वो समझता था सबमें स्वार्थ है
पर वो गलत था वो
क्या कोई
सिगरेट को स्वार्थी कह सकता है!


लेखन तिथिः ६ जून २००४