रविवार, 2 अप्रैल 2006

हे भगवान! मुझे कुत्ता मत बनाना

भागा जा रहा था वो
पग-पग पर खून के धब्बे छोड़ते हुए
पीछे थे खून के प्यासे
देखता जा रहा था इधर-उधर
आखों में दया की भीख थी
शायद कोई दिख जाए राम या रहीम
शायद कहीं उतर आये ख़ुदा
बचा ले उसको दरिन्दों से
पर नहीं था वो मनुष्य
बेचारा कुत्ता!
क्या जाने वो
परमात्मा ने हमेशा लिया है अवतार
मनुष्यों के लिये
काश कि पढ़ा होता वो भी
गीता और कुरान
मालूम होती उसे बाइबिल की सीमाएँ
हमेशा अस्तित्व का खतरा हुआ है
इंसान को
कुत्तों के भविष्य में इससे बढ़कर कुछ नहीं
दिखाऒ हमेशा वफ़ादारी एक बेईमान को
करते रहो रखवाली आश्रयदाता की
नहीं करोगे तो जाओगे कहाँ
है सीमित
तुम्हारे लिये इस धरा की जमीन
"हे भगवान!
बना दे इस बार मुझे भी मनुष्य
ताकि मिटा सकूँ ये विडम्नायें
खत्म कर दूँ असमानतायें"
सहसा लड़खड़ा गया वो
क्या कोई अपशब्द कहा था उसने
शायद-------
देखना बन्द कर दिया था इधर-उधर
दौड़ते-दौड़ते पहुँच गया था
दूसरी दुनिया में
हो सकता मिला हो सकूँ उसे वहाँ।।।


लेखन तिथिः २९ अगस्त २००४ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६१ श्रावण मास (द्वि॰) शुक्ल पक्ष की द्वादशी

19 टिप्‍पणियां:

Pratik ने कहा…

शैलेश जी, हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। वैसे, मैं आपका पड़ोसी ही हूँ, आगरा में रहता हूँ।

Pratik ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
Raman Kaul ने कहा…

शैलेश जी, मेरी ओर से भी हार्दिक स्वागत। वैसे, मैं भी दूर का नहीं हूँ। फरीदाबाद का वासी हूँ, पर अभी मिट्टी से दूर हूँ।
बहुत सुन्दर कविता लिखी है। यूँ ही लिखते रहिए।

Raman Kaul ने कहा…

PS:
सुस्वागतम्

Amit ने कहा…

हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है। :)

और मैं भी पास ही में रहता हूँ, नई दिल्ली में। ;)

अनुनाद सिंह ने कहा…

बधाई हो ! आपकी मेहनत सार्थक हुई | ऐसे ही अपना जुझारूपना बनाये रखिये |

अभिनन्दन ! स्वागतम !!

दीपक ने कहा…

कविता और चिट्ठा , दोनों के लिए बधाई। जब सब बता रहें हैं, तो हम क्यों पीछे रहें, हम भी रूरकी से हैं। बाकी सब से दूर तो नहीं है न?

रजनीश मंगला ने कहा…

अरे जार शैलेष, तुम तो आते ही छा गए। बहुत बहुत बधाई।

Ankur Mittal ने कहा…

its a nice attempt lekin aapki kavita me tukbandi ki kami hai koi baat nahi dheere dheere yeh bhi aa jayegi.waise prayas ke liye badhai

Jitendra Chaudhary ने कहा…

शैलेश भाई,
स्वागत है आपका हिन्दी चिट्ठाकारी में।वैसे तो मै कानपुर का हूँ, लेकिन काफी समय दिल्ली में बीता है।इस लिहाज से पड़ोसी हुए।आजकल रोटी की खातिर मिट्टी से दूर कुवैत में हूँ।

आपके ब्लॉग का फीड नारद मे जोड़ दिया गया है।

जयप्रकाश मानस ने कहा…

कविता कर्म के लिए आपको बधाई देना चाहता हूँ । कविता पर आपकी गंभीरता की जरूरत होगी । पर इस समय में आपको इस ब्लाग के लिए बधाई ढेर सारी । मुझे आप हिन्दी का सेवक कह सकते हैं । कविताओं पर गंभीर अभिरूचि हो तो आप का स्वागत हैं यहाँ- http://kavitayan.blogspot.com/

प्रभात टन्डन ने कहा…

प्रिय शैलेश भाई,
प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित करने के लिये बहुत-बहुत बधाई, जितेन्द्र जी पडोसी बनाने में काफ़ी निपुण हे, मुझे भी आप अपने नजदीक ही पायेगें।
प्रभात टन्डन

Raman Kaul ने कहा…

टिप्पणियों पर थोड़ी सी नुक़्ताचीनी (ऐसे ही मस्ती के लिए)
ग़लत -> सही
शैलेष -> शैलेश
जितेन्द्र -> जीतेन्द्र
टन्डन -> टण्डन/टंडन
रूरकी -> रुड़की
अभिरूचि -> अभिरुचि
जगत् -> जगत
स्वागत् -> स्वागत
वैसे हम चिट्ठाकारों को वर्तनी पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है। अनजाने में हुई त्रुटियाँ तो मैं ने छोड़ ही दी हैं।

Udan Tashtari ने कहा…

"सहसा लड़खड़ा गया वो
क्या कोई अपशब्द कहा था उसने
शायद-------"...क्या बात है भाई...बहुत सुंदर,,,,माध्यम बनाये शब्द ना जाने कितनी अन्य बातें बयां करते हैं..बधाई..
समीर लाल

ANIL KUMAR TRIVEDI ने कहा…

priya,
Salesh ji,sarvpratham aapke iss kavitt-prayash ke liye subhkamnayein.Ek nireeh jeev par sabdo ka bhavuk prayog nischit hi prasansa ke yogya hai,Sabdo ka sangarsh jaari rakhein...

Chander Dogra ने कहा…

saliesh ji bahut hi acca lika hai. Mein jammu ka rahne wala hoon filhal Bangalore mein roji roti kama raha hoon.

yaggi ने कहा…

really very gud effort..
poem shows reality..of this world..

achcha laga ki aap itni achchi kavitayein likhte hain!!

Dharmesh Pathak ने कहा…

this poem is really good.

बेनामी ने कहा…

priya
shailesh
Aapki kavitain padhkar bahut acha laga....
aise hi likhte rahiye
prabhat singh(aapka apka mitra)