शनिवार, 8 अप्रैल 2006

दास्तान-ए-मुहब्बत

एक दिन अचानक
क्षितिज के उस पार
तेरा कांत रूप दिखा था मुझे।
मैं दौड़ा था तुम्हें रोकने के लिये
अपना अवलम्ब बचाने के लिये।
पर काल के वायु-वृत ने
अपने आगोश में भर लिया था
और फेंक दिया था
क्षितिज के दूसरे किनारे पर।
फिर भी हिम्मत नहीं हारा था
चलता चला था तुम्हारी खोज में
पर जब उस छोर पर पहुँचा
तो इस छोर पर नज़र आई थी तुम।
बैठकर खूब रोया
मंदिरों में जाकर उपासना भी की
पर काल ने मेरी एक ना सुनी
तुम जा चुकी थी अज्ञात शांतवन में।
इस निरीह कुंज में
मैं अकेला रह गया था।
समय के आशुवत् परिवर्तन ने
बहुतों को छीन लिया था मुझसे।
कोई लक्ष्य नहीं, कोई उमंग नहीं
बिन पतवार की नौका की भाँति
लगता रहा था
इस कगार से उस कगार पर।
सहसा गर्जना हुई थी
आकाशतल में
तारे और नक्षत्रवृंदों का समूह
चमकने लगे थे दिन में ही।
यह कैसा दिवस था
मैं कुछ सोच नहीं पा रहा था
हिमालय को बींधते
उल्कापिडों का अग्निवर्तन
विंध्य के जलप्रपातों का
उल्टा (उलटा) प्रवाह।
विज्ञान के सारे सिद्धांत
या ये कहें प्रकृति के जड़वत् नियम
क्या सही, क्या गलत
कुछ निर्धारित करना मुश्किल था।
भास्कर के अविखंडित प्रकाश में
तुम्हार नूर नज़र आया था।
मैंने लपकना चाहा था तुमको
तो देखा वास्तव में
मैं तुम्हारी ओर आ रहा हूँ।
पक्षियों की तरह उड़ते-उड़ते
जब मैं तुम्हारे पास पहुँचा
तो बहुत खुश हुआ था
क्योंकि मैंने अपनी मंजिल पा ली थी
जी कर ना सही मरकर।

लेखन तिथिः १२ दिसम्बर २००३ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६० पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्थी

7 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढिया रचना है, शैलेश भाई. बधाई.
समीर लाल

govind ने कहा…

this is one of best kavita which i ever heard

MAN KI BAAT ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति है। प्रेमलता

govind ने कहा…

i think ye awaj aapke dil se nikalti haiaur ek kavita ban jati hai. hum eska raspan kar ke anugrihit hue
hamari taraph se aapko is kavita ke liye dhero subhkamnaye

बेनामी ने कहा…

Your poems are really great, I welcome you to share it on www.shayeri.net

Webmaster@shayeri.net

Hitendra ने कहा…

वाह! क्या कविता है बहुत अच्छे। प्रेम कविता मैं कभी नहीं लिख पाता। क्योंकि मुझे लगता है कि उसके लिये अनुभव चाहिये।

Nysh ने कहा…

ये कुछ ठीक है।

निशान्त