मंगलवार, 7 नवंबर 2006

प्रेम-पुष्प-५

प्रिये,
सुबह का प्रहर है,
सूर्य की किरणें कक्ष में
इधर-उधर दौड़ने लगी हैं।
तुम अभी-अभी
कोई नया-नया सपना देखकर जगी हो।
शीत का कंधा थामे दूब
ठंडी हवाओं को धिक्कारती झाड़ियाँ
हेम से जूझता अलाव
और आशियाने से उड़ते पक्षी
सब तुम्हारा और
इस नये साल का स्वागत कर रहे हैं।
मुझे भी तुम्हारे जगने की आहट
मिल चुकी है।
यह वर्ष मेरे लिए भी विशेष है
तुम्हारा आगमन
तुम्हारा रूहानी स्पर्श
अपरिभाषित सम्बन्ध
अलिखित दासता
एक विचित्र सा अनुभव!
सबको नववर्ष की बधाईयाँ
दे चुका हूँ मैं।
पर किस तरह से करूँ
तुम्हें नव वर्ष मुबारक?
कुछ समझ नहीं पाता हूँ।
नहीं लिख पाता हूँ
भावनाओं की उथल-पुथल।
जब बात करता हूँ तो
कँपकँपाती है आवाज़
जब चलता हूँ तो
डगमगाते हैं कदम।
शहर से गुजरता हूँ तो
फेंकते हैं लोग पत्थर
बादल को भी
मेरा नाम दिया जाता है।
इतना होने पर भी
नूतन वर्ष में खुशियाँ अपार हैं।
क्या हुआ जो हम-तुम पास नहीं हैं?
दूरी मिटाने का बहाना तो है-
शायद इस बार
नव वर्ष ने रूप लिया है उसका।


लेखन-तिथि- २६ दिसम्बर २००४ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६१ मार्गशीर्ष की पूर्णिमा।

5 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

सुन्दर शब्द संयोजन. अच्छा प्रवाह.

Medha Purandare ने कहा…

yeh aashawadi kavita hain, lekin aakhir mein nirashawadi ho gayi.
In all,nice !!

Udan Tashtari ने कहा…

शुरुवाती पंक्तियों का अंतिम पंक्तियों से कुछ विरोधाभास लगता है, मगर अभिव्यक्ति और भाव अच्छे हैं, बधाई.

बेनामी ने कहा…

it is really very nice
I think u should try to write better and definetely have the potential to write better
good luck

बेनामी ने कहा…

क्या कहते हो?
सच है क्या...
मुनिया के पापा को किसने मारा,
तुमने कुछ सुना है इसके बारे मे कभी
अच्छा है......
अन्धेरे मे जीना,
सपनो मे रहना,
खुद ही खुद से बाते करना!