शुक्रवार, 24 नवंबर 2006

प्रेम-पुष्प-७ (अंतिम रचना)

टूट-टूट कर बिखर गया पूरा वज़ूद
उदासी के पत्थर से।
फट गयी आस्था की नस
खालीपन के नश्तर से।
गिर गयी विश्वास की दीवार
वास्तविकता के धक्के से।
बिक गयी आज फिर से
मुहब्बत की बिरादरी
उन्हीं कागज़ी नोटों से
जिनका इस्तेमाल करते थे वे
उपहारों के लिए
तड़प कर रह गया मछली सा मन
जब फेर ली उसने दरियाई आँखें
बस साँस ले रहा हूँ।

लेकिन कब तक ले पाऊँगा
डॉक्टरी मदद?
क्षणिक हो गया है सबकुछ
दिल का कोना-कोना भर गया है।

नहीं कुछ कर पाया
दर्शन को पढ़कर
शायद अब उतरूँगा मैं
पागलपन के साथ
बता दो जमाने को
अब नहीं होगी शिकायत उनको
मुझसे।
नहीं देखूँगा आशिकों के ख़्वाब
लूँगा मैं भी गंदी हवाओं में साँसें
छोड़ दूँगा हर अच्छाई को
शामिल हो गया हूँ आज से
मैं भी समन्दर में
अब मैं गंगा नहीं रहा
हो गया है ख़ारा सारा का सारा वज़ूद।

ऐ हवा!
कहना उनसे
नहीं है उनसे कोई शिकायत।
मरा हूँ नहीं अभी मैं
वही कहें कैसे जा सकती है
रूह इस ज़िस्म से
वादा तोड़ दे भले ही वे?
खींच कर मार दें
एक तीर प्यार का
वादा रहा मेरा
खून का क़तरा-क़तरा जोड़ेगा
मेरा दिल और
बना देगा एक धारा
और पहुँच जायेगा उनके चरणों तक।


लेखन तिथि- २१ फरवरी २००५

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत ही अच्छी रचना ।

Medha Purandare ने कहा…

Ye kya,kharapan kahanse aaya hai? Antim rachana nirashajanak ho gayi hai.
Aur ek pryas kijiye.

भुवनेश शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना शैलेशजी
बधाई

shailesh Agrahari ने कहा…

Dear,
Life is full of surprises & nre things. Getting stuck in one emotion for a life long and saying thei is end is no life.
What happened to "Na Dainyam NA Palayanam".
Please write some thing which gives (Yeh giving) hope & expectation from life