सोमवार, 11 जून 2007

उनका मज़ा

हमारे पेशेंस को आज़माकर, उन्हें मज़ा आता है
दिल को खूब जलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

खूब बातें करके जब हम कहते हैं "अब फ़ोन रखूँ?"
बैलेंस का दिवाला बनाकर, उन्हें मज़ा आता है।

उन्हें मालूम है नौकरीवाला हूँ, मिलने आ नहीं सकता
पर मिलने की कसमें खिलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

हम तो यूँ ही नशे में हैं, हमें यूँ न देखो
मगर जाम-ए-नैन पिलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

हम खूब कहते हैं शादी से पहले यह ठीक नहीं
सोये अरमान जगाकर, उन्हें मज़ा आता है।

वैसे खाना तो वो बहुत टेस्टी बनाती हैं
मगर खूब मिर्च मिलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

वो जानती हैं, हमारी कमज़ोरी क्या है, तभी
प्यार ग़ैर से जताकर, उन्हें मज़ा आता है।

शब्दार्थ-
पेशेंस-
धैर्य, बैंलेस- उपलब्ध धनराशि, टेस्टी- स्वादिष्ट।

लेखन-तिथि- २२ नवम्बर २००६ तद्‌नुसार विक्रम संवत् २०६३ मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष द्वितीया।

43 टिप्‍पणियां:

tanha kavi ने कहा…

धांसू लिखे हैं भाई।

रिपुदमन पचौरी ने कहा…

शैलेश,

संयुक्त शब्दों के विश्य में कुछ कहता हूँ.

तुमने जो लिखा है "जाम-ए-नैन" ---> ऐसा प्रयोग वर्जित है।
निगाह-ए-जाम लिख देते तो ठीक होता, "नैन" शब्द नहीं लिख सकते।

उर्दू शब्दों के साथ उर्दू का ही शब्द हो ... और हिन्दी के शब्दों के साथ हिन्दी का ही हो। यह ध्यान देने योग्य बात है।

लिखते रहो...
रिपुदमन पचौरी

ग़रिमा ने कहा…

भारी-भरकम कविताओं से अलग नटखट सी ये कविता पसन्द आयी :)

sifar ने कहा…

हम उनके साथ रहने को बनाते हैं रेत के घरौंदे ,
लहरों में जो मिट सी जाती है ,उन्हें मज़ा आता है।

हाथों को जोड़ कर अपने जो हम चाँद बनाते हैं,
हर एक चीज को चाँद बना दो,उन्हें मज़ा आता है।

शी लव्स मी-शी लव्स मी नाट,कह कह के ,
किस्मत को रोते हैं,
लकीरें बनाने मिटाने में ,उन्हें मज़ा आता है।

मजा आ गया शैलेश.... मैं भी रौ मे आ गया।
साभार,
श्रवण

Raja Babu ने कहा…

Bahut khoob Shailesh Ji,
Bilkul meri kahani hi likh dali aapne to.

Keep it up.

Thanx and Regards,

Rajeev Pandya

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

शैलेश जी..

आनंद आ गया इस हिंगलिश के प्रयोग को पढ कर। बहुत ही अनूठे प्रयोग हैं:

खूब बातें करके जब हम कहते हैं "अब फ़ोन रखूँ?"
बैलेंस का दिवाला बनाकर, उन्हें मज़ा आता है।

वैसे खाना तो वो बहुत टेस्टी बनाती हैं
मगर खूब मिर्च मिलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

:)

रिपुदमन जी की टिप्पणी से मैं पूर्णत: असहमत हूँ। जो भी वर्जनायें उन्होंने बतायीं है वह गालिब-जफर-जौंक के साथ विसर्जित हो गयीं। यह समझने वाली बात है कि यह गज़ल नहीं है, यह एक प्रयोग धर्मी काव्य है जहाँ एसे प्रयोगों की नितांत आवश्यकता है। "जाम-ए-नैन" का जो रस इस रचना मे आया है उसका लेशमात्र भी "निगाह-ए-जाम" में नहीं।

यह कहा जाना कि "उर्दू शब्दों के साथ उर्दू का ही शब्द हो ... और हिन्दी के शब्दों के साथ हिन्दी का ही हो।" यह एक खास वर्ग के लेखक/कवियों का पूर्वाग्रह है। इससे बचा जाना चाहिये। सटीक शब्द हों, प्रभावी हों....हिन्दी-उर्दू के झमेले में फीते ले कर लिख रही जमात को ही छोड दें।

आपकी रचना को मैं अच्छा प्रयोग कहूँगा, कुछ गुंजाईश अभी भी है लेकिन।

*** राजीव रंजन प्रसाद

sunita (shanoo) ने कहा…

शैलेश तुम हर तरह की रचनाओ में पारंगत हो...
आज हास्य रचना लिख कर तुम्ने साफ़ बता दिया है,...कौन है वो खुश नसीब बस इतना बता दो?
दोस्तों से छुपाना अच्छी बात नही भाई...अच्छी लिखी है...

सुनीता(शानू)

Anupama Chauhan ने कहा…

gud combination of english,english and urdu

अजय यादव ने कहा…

कविता बुरी नहीं है, शैलेष जी। अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी ठीक है। सिर्फ कविता में गेयता की कमी अखरती है।
रिपुदमन जी की बात से भी मैं सहमत हूँ। भाषा-प्रयोग में सावधानी रखनी चाहिये। परंतु निगाह-ए-ज़ाम शब्द का प्रयोग लय में अवरोध उत्पन्न करता। कुछ और शब्द रखे जा सकते थे। यूँ निगाह-ए-ज़ाम और ज़ाम-ए-निगाह में बहुत बड़ा फर्क भी है। गौर करें।
राजीव जी की बात से मैं सहमत नहीं हो सकता। किसी भी बात को महज़ उसके पुराना होने के आधार पर नकारा नहीं जा सकता। ऐसा करने से पूर्व, उसकी पूरी समीक्षा होनी चाहिये और इस विषय में शायद इसके लिये उपयुक्त आधार ढूंढना इतना आसान न होगा।

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

हा, हा , हा

अजय यादव ने कहा…

और हाँ, वो खुशनसीब है कौन? हमें भी तो बताइये।

कुमार आशीष ने कहा…

'हम तो यूँ ही नशे में हैं'..... थोड़ी खुमारी के साथ थोड़ा चुलबुलापन तो ठीक मगर 'जाम-ए-नैन' में संपुटित रुमानी सौन्‍दर्य का जवाब नहीं।

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

अजय जी,

नकारने का प्रश्न कहा उठता है। किसने रोका है कि आप मीटर में नाप नाप कर गज़लें न लिखें या दोहे, चौपाई, छंद न लिखें (आम तौर पर आप भी तय नीयमों में नही लिखते)। आपको स्वतंत्रता है और उसकी अपनी जगह है, अपने पाठक हैं। नयी कविता को अपने नीयम निर्धारित करने का अधिकार है और अपनी दिशा तय करने का भी। लेकिन तय नीयमों को कदाचित यह छूट नही कि कवि को उसका वांछित स्पेस न दे। तो फिर नयी कविता की उपादेयता क्या है? यह भी कविता है और पूरे ताल ठोक कर कविता है। यह जानते हुए भी कविता है कि नयी कविता लिखने वालों में भी अभी नयी कविता की समझ विकसित नहीं हो सकी है। जाम-ए-नैन एक विलक्षण प्रयोग है..अब मुझे यह भी बतायें कि ये वर्जित करने की बात हिन्दी की किस व्याकरण पुस्तक में लिखी है। जाम-ए-नैन से जो हास्य निकल रहा है उसका निगाह-ए-जाम रिप्लेसमेंट कदाचित नहीं हो सकता। यदि कर दिया गया तो उस शेर का समूल विनाश हो जायेगा :)

*** राजीव रंजन प्रसाद

aashish maurya ने कहा…

मस्त लिखी हैं भाईं
खास तौर पर ये पंक्तिः
"हम खूब कहते हैं शादी से पहले यह ठीक नहीं
सोये अरमान जगाकर, उन्हें मज़ा आता है।"

अजय यादव ने कहा…

राजीव जी,
नयी कविता को अपनी दिशा व नियम निर्धारित करने का पूरा अधिकार है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप करने का विरोध, मैं भी करता हूँ। परंतु यदि नयी कविता पर ही आपका जोर है, तो फिर गज़ल या शेर जैसे नियमबद्ध काव्यरूपों का प्रयोग ही क्यों किया जाये? मुक्त काव्य-शैली का ही प्रयोग करें। रही बात हिंदी के व्याकरण की तो शब्द-साम्य को सुंदर भाषा प्रयोग का उदाहरण माना गया है। और कविता में भाषा सौन्दर्य की अपेक्षा करना तो गलत नहीं होना चाहिये।
आपने निगाह-ए-ज़ाम से ज़ाम-ए-नैन को बदलने का जो विरोध किया, उससे तो मैं पहले ही अपनी सहमति जता चुका हूँ। आपने शायद मेरी बात को ध्यान से नहीं पढ़ा। हाँ, मेरी असहमति का कारण आपसे अलग है। आप ज़ाम-ए-नैन को बेहतर मानते हैं, जबकि मैं निगाह-ए-ज़ाम को अर्थ में अंतर के कारण गलत मानता हूँ। इस शेर को यूँ भी लिखा जा सकता था (शैलेष भाई इसे कृपया अन्यथा न लें। यह सिर्फ एक सुझाव है।) -

हम तो यूँ ही नशे में हैं, हमें यूँ न देखो
मगर जाम आँखों से पिलाकर, उन्हें मज़ा आता है।

शैलेश भारतवासी ने कहा…

रिपुदमन जी,

मुझे यह तो नहीं पता कि कविताओं/ग़ज़लों में हिन्दी के साथ अन्य देशज़/विदेशी शब्दों का प्रयोग वर्जित है या नहीं। मगर यह अवश्य पता है कि हिन्दी शब्दभंडार के अनेकों शब्द अंतरभाषीय उपसर्गों और प्रत्ययों की मदद से बनाये जाते हैं क्योंकि इससे शब्द भी जनसुलभ हो जाते हैं और शब्दकोश भी समृद्ध होता है। मैं कुछ-एक उदाहरण पेश करता हूँ-
उपसर्ग-
बद (फ़ारसी)- बदचलन, बदचलनी,
हर (उर्दू), हर समय, हर दिन

प्रत्यय-
वार (उर्दू)- भाषावार
साज़ (उर्दू)- रंगसाज़

जहाँ तक बात 'निगाह-ए-जाम' की बात है तो आप ज़रा इस शब्द के अर्थ पर ग़ौर फ़रमाएँ। जब दो शब्दों (यह उर्दू का नियम है) को योजक शब्द '-ए-' से जोड़ा जाता है तो उसका अर्थ होता है 'का/की' (बाद का पहले वाला)। मतलब 'निगाह-ए-जाम' का अर्थ होगा 'जाम का निगाह'। जैसे 'दर्दे-ए-दिल' का अर्थ है 'दिल का दर्द' । इसलिए इस संयुक्त शब्द का यहाँ प्रयोग तो भाषा की अल्पज्ञयानता होगी। हाँ, 'जाम-ए-निगाह' का प्रयोग हो सकता था क्योंकि इसका अर्थ है 'निगाह का जाम' जो शायद मैं कहना भी चाह रहा हूँ। मगर मैं कुछ भी लिखने से पहले कई बार होमवर्क करता हूँ। मैं आँखों के जाम के जितने काम्बिनेशन बन सकते थे, सबकों आज़माया था, मगर 'जाम-ए-नैन' से ही संतुष्ट हो सका। फ़िर भी यदि पाठकों को पसंद नहीं आया तो मुझे रीकंसिडर करना होगा।

राजीव जी,

कम से कम हिन्दी कविता को बँधे-बँधाये नियमों में समेटना बेमानी होगी। यदि मैं नया कवि हूँ तो नई कविता को मुझे ग़ुलज़ार करना चाहिए। और मम्मट, चमदबरदाई, बिहारी आदि के समय से कविता को कई बदलावों का सामना करना पड़ा है। पहले मैं संस्कृष्टनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करता था, मगर मैंने देखा कि उससे पाठक कविताओं में नहीं डूब पाता। जब भारत की भाषा हिंगलिश है तो कविता में केवल तद्भव शब्दों का प्रयोग एक तरह की रूढ़ीवादिता होगी।

अजय जी का कहना भी ठीक है कि पूर्वज कवियों की नियमावली पर प्रश्नचिह्न लगाने से पूर्व उसकी पूरी समीक्षा होनी चाहिए। और वैसे भी नियमों के पचड़ों से बाहर निकलकर अर्थपूर्ण साहित्य-सृजन ही सृजनशिल्पी का धर्म होना चाहिए।

अजय जी,

मैंने इसे लिखने के बाद जब अपने कुछ मित्रों से 'जाम आँखों से पिलाकर॰॰॰' रखने की बात की थी तो ज़्यादातर लोगों ने 'जाम-ए-नैन' पर सहमति जताई थी। खैर बात मात्र सुन्दर सप्रेषणियता की थी। और वैसे भी यह कोई अनूठा प्रयोग नहीं है। ग़ुलज़ार इस तरह के प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं।

कई लोगों ने 'उन्हें' के बारे में जानना चाहा है। अगर कवि 'कल्पना' नामक घोड़े का घुड़सवार है तो उसे कुछ भी कल्पना करने का हक़ है, उसके लिए कुछ भी कल्पनातीत नहीं है।

Surekha ने कहा…

athi sundar dil ko choone waali kavitha, bahut sundar

बेनामी ने कहा…

great kavita hai
I like It most

mahashakti ने कहा…

अच्‍छी कविता है, मै राजीव जी से सहमत हूँ पर मै यह तभी कहूँगा जब आप बताऐगें वो कौन है ? :)

priya sudrania ने कहा…

अच्छी लगी आपकी कविता.........
टेक्निकेलिटी का हिसाब तो मुझे पता नहीं,पर यूं कविता
पढ़ने मे मज़ा आया.........कुछ पुराने दिन याद आ गये।
बहुत खुब!!!!

अजय यादव ने कहा…

शैलेष जी,
मैंने जो लिखा था, वह आपके द्वारा प्रयुक्त शब्द से श्रेष्ठ कुछ लिखने का प्रयास नहीं था। मैं केवल यह कहना चाह रहा था कि प्रयुक्त पद की जगह और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था। निगाह-ए-ज़ाम को तो मैं पहले ही अर्थ में अंतर के चलते नकार चुका था। सम्प्रेषणीयता की बात करें तो जब रिपुदमन जी गलती कर बैठे तो किसी अन्य सामान्य पाठक से यह गलती होना, संशयपूर्ण न होगा।
एक बात और शैलेष जी, इस टिप्पणी में आपने टंकण की गलतियाँ काफी कर दी हैं। शायद जल्दबाजी में। एक शब्द का विशेष उल्लेख करना चाहुँगा, आपने 'अल्पज्ञयानता' का प्रयोग किया है जबकि सही शब्द 'अल्पज्ञता' है। और हाँ, आपकी रचना के पीछे किसी व्यक्ति विशेष को मैं तलाश नहीं कर रहा था, वो महज़ एक मजाक था। कृपया अन्यथा न लें।

Gaurav Shukla ने कहा…

ह्म्म्म्म्
एक बार फिर वही घिसी-पिटी बातों पर निरर्थक चर्चा
"समय नष्ट करने के सौ तरीके" में से एक यह भी है
सच कहूँ तो बहुत दुःख होता है कि कविता के मूल भाव की ऐसी तैसी कर हमारे प्रिय मित्र न जाने क्यों नियम,कानून में ही उलझ जाते हैं|हद तो तब हो जाती है जब कविता को मीटर, सेंटीमीटर, गज,फुट,इंच में नापा जाने लगता है|अरे यार, हास्य है तो हँस लीजिये....
कवि की स्वतन्त्रता तो जग प्रसिद्ध है...आखिर ये मीटर, बहर भी तो पहली बार बने होंगे कभी? क्या उससे पहले कविता नही थी? हाँ, ये अवार्ड,पुरस्कार जरूर अब बने हैं
ठीक है, नये प्रयोग हमेशा हर क्षेत्र में आवश्यक हैं इन्हें रोक कर कविता के विकास मे रोडा अटकाने का काम क्यों किया जा रहा है|नियमबद्ध लेखन मात्र मूल भाव की हत्या करके ही सम्भव है और यह उनके लिये ही आवश्यक है जिन्हें अपने लेखन को सराहे जाने की चिन्ता है|नये प्रयोग करने में आखिर हानि ही क्या है...यदि कोई सुप्रसिद्ध कवि कोई नया प्रयोग करे तो हम सभी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते नहीं थकेंगे...
कबीर ने अपने दोहे लिखे तो हमारे महान विद्वानों ने उनकी भाषा को "खिचडी" भाषा का नाम दे दिया क्योंकि पल्ले नहीं पडी तो क्या करते|अब बेचारे पूज्य कबीर जी को तो अपनी सीधी सादी बात कहनी थी सीधी सादी भाषा मे सो कह दी जिसे पढना हो पढे जिसे न पढना हो न पढे,लेकिन दर्शन इतनी सरलता से भी लिखा जा सकता है ये तो आज के सुधी कवियों के भी बस का नहीं....स्वर तेज हो रहा है क्षमा करियेगा ...लेकिन बाहर निकलिये भाई इन सब बातों से और ऐसे प्रयोगों को प्रोत्साहित करिये

कविता ने मुझे खूब हँसाया...कविता अपने उद्देश्य मे सफल है
बधाई शैलेश जी

सस्नेह
गौरव शुक्ल

Sagar Chand Nahar ने कहा…

बहुत ज्यादा संस्कृतनिष्ठ शब्दों में लिखि कविता तो अपने भी पल्ले नहीं पड़ती और फिर आजकल इस तरह की कविताओं को कूड़ा कहने का फैशन भी चला है। हाँ एक बात है थोड़ी बहुत घालमेल ठीक है पर अति ना हो। कहीं भाषा इस तरह के प्रयोगों से एक दिन नष्ट ना होने लग जाये। इस बात का ध्यान भी आपको ही रखना है।

भाइ शैलेष जी मुझे तो कविता अच्छी लगी। आगे भी इन्तजार रहेगा।

praveen ने कहा…

शैलेश जी!
आपने हंसने का अवसर दिया था ,मैं फ़ायदा नहीं उठा पाया.ठा ठा करके अगर नहीं ,तो मंद-मंद मुस्कराया जा सकता था. पर खैर--

इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि जज़्बातों को ज़ाहिर करने की सहजता कवि को मिलनी चाहिये,शर्त--सम्प्रेषणीयता बनी रहे पाठक के साथ.
और केवल उर्दु-हिन्दीके संयुक्त प्रयोग ही क्यों,अन्य प्रादेशिक भाषायों के शब्द भी प्रयोग करने की उपादेयता देखी जा सकती है,पूर्व लिखित सहजता के साथ

आखिर सवैय्या,चौपाई आदि भी किसी भी भाषा मे रहकर भी सवैय्या या चौपाई ही रहती हैं,

सादर

प्रवीण पंडित

Anita ने कहा…

Shailesh ji
badhai
bahut hi shandaar kavita likhi hai
lekin ek baat battaiye shaadi se pehle aap manaa kerte hai aur woh israar...ulti ganga behti hai kya ...ha ha ha ...lekin phir bhi bahut badhiya hai

सुनील डोगरा ज़ालिम ने कहा…

उनका तॊ आप जानें भैया पर लगता है हमें तरसाने में आपकॊ मजा आता है

यकीन मानिए कविता पढकर मुहं में पानी आ गया

Tame me I am tired ने कहा…

Praudhokik vaadi yug ki utrkrash rachna. Is yug ka udgaar kuch chaar ek varsh pehle hua tha jab desh kaal vatavaan ki deevarein tod kar hindi kavita saste waale hastnirmit sokhta sadrashya pannon se nikal kar LCD Screen par chamkne lagee. is yug ki parichayak hai ye kavita, kavi ki unmuktata ki, evam tatkaleen vastavikta ki ghor parichayak................adbhut hote hue bhi lokpriya.

रिपुदमन पचौरी ने कहा…

"निगाह-ए-जाम" को बक्श दो भाई ...
==========================
भाई साहब राजीव, कवि शैलेश, और पाठक अजय यादव जी,

१. "जाम-ए-नैन" को गलत बताया गया, वो इसलिये क्योंकि वो गलत ही है ( विस्तार से बताऊँगा कि क्यो है)

२. "निगाह-ए-जाम" या "जाम-ए-निगाह" पर क्यों बहस कर रहे हैं आप यह तो उदाहरण है, संयुक्त शब्द बनाने का, मैंने कहा "निगाह-ए-जाम" ठीक होता वह कविता की गेयता और अर्थ को देखते नहीं कहा अपितु व्याकरण की दृष्टि से कहा है. सो इस बात पर निर्थक चरचा ना करें। यह शैलेश के "जाम-ए-नैन" का रिप्लेसमेंट नहीं हैं मित्र .. ज़रा मर्म तक तो पहूँचें, या कोशिश मात्र भी करें तो बेहतर होगा।

३. मेरे भाई शैलेश ये प्रतय्य उप्सर्ग नही हैं मेरे भाई !!!
जो उमने उदाहरण दिये है वो इस संदर्भ से अलग की बात है। ऐसे तो english के भी बहुत से शब्द हैं जिन को प्रतय्य मान कर प्रयोग किया जाता है जैसे :-

peremeter = pere + meter
हिन्दी में इस का स्वरूप होता "परि" शब्द
जैसे : परिभाषा, परिकथा .. इत्यादि

पर हम इस प्रसंग की बात ही नहीं कर रहे। सो अभी प्रतय्य उप्सर्ग विनम्रता से बक्श दिया जाये।

४. भाई राजीव, तुम कहो तो हम बिना कहे ही हार मान लें ? हारे को हरी कह कर खुश हो लें ?

ताल ठोकने की ज़रूरत नही है इधर : बात को समझो और स्विकारो। सिविकारो इस लिये क्योंकि यह सही है। वैसे अस्विकार भी करो तो उस से कुछ मुझे अधिक अंतर नहीं पड़ता।

अब आगे ....

उर्दू कुछ अलग है हिन्दी से
इस में आप अपने मन चाहे शब्द बना सकते है !
कोई शब्द कितना भी लम्बा हो सकता है. ऐसा भी हो सकता है कि एक पंक्ति में एक ही शब्द हो ! पर उस एक शब्द का आकार ५० या १०० अक्षरों जितना भी हो सकता है...

जैसे...
इबन-ए-मरियम
यानी मरियम का बेटा
"ए" अक्षर इस में संयोजक है
"मरियम का बेटा" ये ३ शब्द ना लिख कर इधर एक ही शब्द लिखा गया है "इबन-ए-मरियम " ... उर्दू भाषा में ऐसी फ़ैसीलिटी है, कुछ अन्य भाषाओं में भी है, पर हिन्दी में नही है।

अब इस प्रकार के कम्पोज़िट शब्दों में कहा गया है कि उर्दू के शब्द के साथ उर्दू का ही शब्द आये।

अभी हमने "रचना" के बाकी चहरों को तो निहारा भी नही है, पर आपने ये "गज़ल" का प्रसंग क्यों छेड़ा यह सु-स्पष्ट नहीं है।

वैसे ये गज़ल नहीं है ( पर हम शिल्प की अभी बात ही नहीं कर रहे ) सो हम इस विषय पर कुछ नहीं कहेंगे।

"रचना" शब्द का ही प्रयोग करेंगे। आपको यह रचना पढ़ कर आनंद आया बहुत खुशी की बात है। इस पर प्रतिक्रिया या इसका विरोध नहीं कर सकते हम और ना ही हमको करना चाहिये।

>> "आप मीटर में नाप नाप कर गज़लें न लिखें या दोहे, चौपाई, छंद न लिखें (आम तौर पर आप भी तय नीयमों में नही लिखते)"

भाई रंजन, ऐसा है .. "कोई नाप के ना लिखे" या "कोई जान बूझकर नापकर ना लिखे" या "कोई लिखने का प्रयत्न करे और ना लिख पाये" तीनो बातों में अंतर है। सो अजय के लिये यह कहना अनुचित सा लगता है।

अभी बहुत कुछ है कहने को ... पर हम पहले भी बहुत जगह इस बात पर बहस कर चुके है कि कविता किस को कहे, क्या शब्द प्रयोग करें..... सो संदर्भ से मैं, इस मंच पर नहीं भटकना चाह्ता। हम केवल "नैन" की ही बात करेंगे :)

६. अजय, तुम्हारा कहना ठीक है।
अब आशा है, "निगाह-ए-जाम" को तुमने भी माफ़ कर दिया होगा।

७. शैलेश , बड़ों ने कहा था कि "लिखने से ही लिखना आता है", सो लिखते रहो......

रिपुदमन पचौरी

Pratik ने कहा…

वाह भाई, बढ़िया कविता है। पढ़कर मज़ा आ गया। 'जाम-ए-नैन' का प्रयोग भी अनूठा लगा।

Addy ने कहा…

Such a wonderful scarp........Meri Shaadi to nahi hui lakin aise problem mere saath bhi hoti hai......very nice thinking........my all best wishes are always with u.......

thanks again
Aditya

shrdh ने कहा…

hmm tumhari si kavita main sach bhi hai bayang bhi hai aur haasya bhi hai

mujhe padhna achha laga

but dear yahi to hai wo jaha sab ladhke paise ganvakar bhi khush ho jaate hain hahaha ab apna apna experience aise hi bataoge na kyu ji ?

जयप्रकाश मानस ने कहा…

यह हज़ल विधा में निबद्ध है । शे'र वज़नदार हैं । जिस ग़ज़ल में हास्य, चुटकी, कटुक्ति, व्यंग्य का फैलाव ज्यादा होता है उसे हज़ल कहा गया है । उर्दू में भी यह परम्परा है । इस विधा को दैनिक भास्कर काफी समर्थन दे रहा है जो रविवासरीय अंक में कई बार और नामी लोगों की हज़ल छाप चुका है ।

इस रचना में भी वह भाव है जो एक सिद्ध हज़ल में होना चाहिए । यह गीत नहीं है न ही गज़ल । हाँ, गज़ल़ के जो नियम स्थापत्य संबधी होते हैं वह यहाँ भी होता है । यह समकालीन कविता भी नहीं है मित्रो ।

ऐसी रचनायें कवि-सम्मेलनों और मुशायरों पर भी खूब चल रही है ।

हाँ, हिंदी साहित्य में यह विधा अभी पैर नहीं जमा सकी है । खास तौर पर अंगद की तरह ।

साध सकते हो तो साधो, इस विधा में मारक भी होती है और मजा भी आता है श्रवणकर्ताओं को ।

पर हरफनमौला होने से कहीं ज्यादा है किसी एक विधा को पकड़ो और इतना सिद्ध हो जाओ कि कहीं नाम भी हो जाये । मर्जी आपकी अपनी है । पर इसका मतलब यह नहीं कि एक ही विधा में लिखो, लिखते रहने का अभ्यास होना चाहिए । इससे दूसरी विधायें भी निखरती हैं । पर अतं में यही राय कि पहचान अक्सर एक ही विधा से बनाने की तैयारी होनी चाहिए और यही होता भी है ।

जानते हैं कि रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक कविता भी लिखते थे, पर उन्हें कोई कवि नहीं कहता ।

बधाई ।

इगा ने कहा…

शैलेश चाचा,
आपकी कविता बहुत अच्छी है। मैं अभी छोटी हूँ इसलिये ज्यादा नहीं समझ पाई। पापा को कहूँगी पढ़्ने के लिये आपका ब्लोग। आप ऐसे ही लिखते रहिये सुन्दर -सुन्दर कवितायें ।

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

प्यारे रिपुदमन भईया जी...

ताल क्या ठोकें। आम की चर्चा में इस बात पर इशारा हो कि समोसे में इमली की चटनी डले या टमाटर की, तो भाई कविता पर हमारी समझ कुछ कम ही है। आप की विद्वत्ता को नमन।

मेरी आपसे असहमति है और इस बात को आपका चार किलोमीटर लम्बा लेख बदल नहीं सका चूंकि रामायण की चर्चा में अर्जुन का क्या करें?

प्रयोगों को व्याकरण के हरे चश्मे से परे भी देखिये तब सावन से आगे बात हो सकेगी। हिन्दी रचनाओं में उर्दू के शब्द या उर्दू जैसे शब्दों को कई बार व्याकरण में कसने के लिये प्रयोग में नहीं लाया जाता अपितु शैलीगत चमत्कार उत्पन्न करने के लिये किया जाता है। मसलन एक शब्द "लवस्कार" को लें जो कि हिंगलिश का कहा जायेगा और अशोक चक्रधर जी बहुधा प्रयोग करते हैं। ये गढे गये शब्द हैं और नयी कविता में इस प्रकार की मरोडन को मैं (अपनी निजी राय से)त्रुटिहीन ही मानता हूँ। यहाँ मसला न तो संयुक्त शब्दों का है न हिन्दी न ही उर्दू का। आपने कहा न कि जैसे "इबन-ए-मरियम ... उर्दू भाषा में ऐसी फ़ैसीलिटी है, कुछ अन्य भाषाओं में भी है, पर हिन्दी में नही है।" यदि गढी जायेगी यह फेसिलिटी तो इसी तरह गढी जायेगी, पूर्वाग्रह ग्रसित हो कर तो कविता निराला और दिनकर से कभी आगे ही नहीं बढेगी।हाँ आपने यह बात सही कही कि आपको मेरे मानने या न मानने से फर्क नहीं पडेगा..भाई मैने चाहा भी नहीं एसा। आपकी अपनी दिशा सही है और हमारी अपनी सोच। दोनो ही रास्ते रचनात्मक तो हैं..?

*** राजीव रंजन प्रसाद

sunita (shanoo) ने कहा…

शैलेश भाई आज तो कविता के साथ-साथ टिप्पणी पढ़ कर मजा आ गया..कोई तो गुरू की एक टिप्पणी को तरस जाता है मगर तुम्हे अपने आप ही दो-दो मिल गई....

बहुत अच्छे भाई लगे रहो...


सुनीता

रंजू ने कहा…

:) वाह बहुत ही नयी और ख़ूबसूरत रचना है ....पढ़ के हँसी रोकी नही गयी ...साथ ही इतनी अच्छी टिप्पणीया भी पढ़ने की मिली ....

महावीर ने कहा…

बहर में ना होते हुए भी खासी अच्छी भली 'हज़ल' है। पढ़ते हुए हंसी भी आ रही है,
अगर किसी कवि-सम्मेलन में भाव-भंगिमा को संभाल कर मंच पर उतर जाएं तो कहकहों के साथ तालियों की गड़गड़ाहट ज़रूर सुनाई देगी।
एक बात ज़रूर कहूंगा कि टिप्पणियों का एक पहलू यह भी है कि अगर सुधारने की गुंजाईश हो तो उस प्रकार की टिप्पणियों को प्रहार ना समझ कर वरदान मानना चाहिइए। वर्ना तो टिप्पणी शब्द हटा कर 'वाह वाही' आदि शब्दों का प्रयोग होना
चाहिइए। वास्तव में हम अधिकतर कवि 'विद्यार्थी' ही हैं, और टिप्पणियों को 'पाठशाला' की तरह मान लें तो रचनाओं में और भी निखार आने लगेगा। ब्लॉग-लेखन का एक यह भी पहलू है।

हम तो यही चाहेंगे ऐ दोस्त तिरी सूरत
कुछ और निखर जाए कुछ और संवर जाए।

शैलेश भारतवासी ने कहा…

महावीर जी,

आपकी इस बात का कि टिप्पणियों से सीखना चाहिए, मैं हमेशा से समर्थक रहा हूँ, इसीलिए हिन्द-युग्म मंच पर टिप्पणियों को हमने इतना महत्व दे रखा है। आपको कभी अवसर मिले तो ज़रूर आयें।

ritu ने कहा…

shaileshji
kavita bahut sundar hai. main to kahungi ki ye bhi bhavnaon ki ek abhivyakti hai.kavita kavi ke hriday ki sahaj abhivyakti hoti hai. usmain
itni mathapachhi wali tipaniyan mujhe kuch ajeeb lagin . khair pasand apni apni khayal apna apna. mujhe sahaj abhivyakti achhi lagi. badhayi ho.God bless u

विभावरी रंजन ने कहा…

स्तरहीन कविता पर टेस्टी का मतलब बता कर बड़ा ही उपकार किया।

विभावरी रंजन ने कहा…

हिन्दी में इस का स्वरूप होता "परि" शब्द
जैसे : परिभाषा, परिकथा .. इत्यादि??????????????????????????????


एकबार मुझे व्यक्तिगत तौर से बतायें कि "परिकथा" क्या शुद्ध लिखा है? जानने की बड़ी ही तीव्र उत्कण्ठा हो रही है।

विभावरी रंजन ने कहा…

वाह!
सचमुच यहाँ तो विद्वानों की फौज मोर्चा सम्भाले जमी हुई है,उपसर्ग प्रत्यय का ही प्रहार हो रहा है।



विलक्षण!!

बेनामी ने कहा…

sach maza aa gaya